ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
मुख्य भोग की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। ब्रह्मचारी को चाहिए कि वह स्त्री-प्रसंग कदापि न करे। यदि वह उप-युक्त नियमों का भंग करता है तो वह ब्रह्मचर्य व्रत का खंडन करता है। जब आप रास्ते में चल रहे हैं तो बंदर की भांति दृष्टि उधर न देखिए। नीचे जमीन की ओर देखते हुए गंभीरता पूर्वक चलिए। नाक की सीध में भी देख सकते हैं। इससे ब्रह्मचर्य के पालन में बहुत सहायता मिलती है।
स्त्री की ओर देखने से आपके मन में उससे बातचीत करने की इच्छा उत्पन्न होगी। बातचीत करने से उसको स्पर्श करने की इच्छा होगी। अन्ततः आपका मन कुसित होकर आप काम के शिकार बन ही जायेंगे। इस लिए स्त्री की ओर काम दृष्टि से कभी भी न देखिए, न उससे एकांत में बातचीत कीजिए और न कभी उसके साथ मित्रता की।
साधकों को चाहिए कि वे लिंग (स्त्री-पुरुष) संबंधों वालीलाप में भाग न लें और न कभी स्त्रियों का चिंतन ही करे। स्त्री का विचार मन में उत्पन्न होते ही अपने इस देवता की मूर्ति का ध्यान कीजिए, अपने इस मन्त्र का बार बार जोर जोर से उच्चारण कीजिए। पशु पक्षियों को प्रसंग करते देख कर या किसी के नंगे शरीर को देखकर यदि आपके मन में काम की भावना उत्पन्न हो जाती तो इससे यही अनुमान किया जाता है कि आपके मन में अभी तक कामवासना गुप्त रूप से भरी हुई है। कुछ व्यक्ति ऐसे अनुरागी और आसक्त होते हैं कि स्त्री के स्पर्श, दृष्टि व स्पर्श मात्र से ही उनका वीर्य पात हो जाता है। ब्रह्मा ! कौसी शोचनीय दशा है उनको यह !
कोई भी साधु किसी स्त्री से हाथ मिलाते हुए या