ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 237 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचारियों के लिये नियम
२०७
नीय ब्रह्मचारियों की जै हो ! वास्तव में वे इस संसार में देवता ही हैं । आप सबों के प्रति उनका आशीर्वाद हो ।
ब्रह्मचारियों के लिए नियम
विवाह न कीजिए, न कीजिए, न कीजिए । विवाह सब से बड़ा वन्धन है । विवाह निरन्तर चिंता और दुःख का स्रोत है । बुद्ध, स्वामी पत्तिनव, भर्तृहरि और गोपीचंद ने क्या किया ? क्या विवाह के बिना वे सुख और शांति में न रहे ?
रुखे (मोटे या भद्दे) बिस्तर पर सोहए । रुखे (आसन) चटाहयां काम में लाहए । बाईं करवट पर सोहये । रात भर सूर्य नाड़ी (पिंगला को) चलने दीजिए । अलग अलग सोहए ।
अपने स्वभाव को शीघ्र परिवर्तन कर दीजिए । इस से आप स्वस्थ, धनवान और बुद्धिमान बनेंगे ।
अपने जननेन्द्रिय की और न देखिए । उसे न छूहये । जब वह उत्तेजित हो तो मूल और उद्विग्न बंध कीजिए । भाव सहित ॐ का बार बार उच्चारण कीजिए । पवित्रता का चिंतन कीजिये । बीस प्राणायाम कीजिये । अपवित्रता रूपी बादल शीघ्र छिन्न-भिन्न हो जायगा ।
ब्रह्मचारी को किसी भी स्त्री की ओर काम भरी दृष्टि से नहीं देखना चाहिये । उसको कुसित भावना के साथ स्त्री के पास जाने तथा उसे छूने की इच्छा नहीं करनी चाहिए । उसके लिए स्त्री के साथ खेलना, हँसी मजाक करना तथा बातचीत करना उचित नहीं है । उसको स्त्री के गुणों की प्रशंसा नहीं करनी चाहिए । न तो अपने मन में और न अपने मित्रों के प्रति ही । वह स्त्री से एकान्त में भाषण भी न करें, न स्त्री का कभी चिंतन ही करें । उसको स्त्री से