भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचारियों के लिये नियम

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उसके शरीर के किसी भाग को स्पर्श करते हुए यदि वह कुत्सित विचारों के साथ नमन करता है तो वह अपने भेष व आश्रम का भान भंग करता है ब्रह्मचर्य व्रत जो एक बार धारण कर लिया है वह जीवन पर्यन्त सब प्रकार के स्त्री-प्रसंग से दूर रहने के लिये है। जैन धर्म में इस नियम पर बड़ा जोर दिया गया है, तदनुसार स्त्रियों के स्त्रियों को देखना, उनका चिन्तन करना तथा स्त्री संबंधी कोई भी बातचीत करना एकदम मना है। इसीलिए तो सब दुर्गुणों में काम को नीचतम (सब से बुरा) बताया गया है।

जो नियम पुरुषों के लिए स्त्रियों के प्रति हैं वे ही नियम स्त्रियों के लिए पुरुषों के प्रति हैं। इन उपदेशों का तात्पर्य यह नहीं कि या तो पुरुष हेय समझे जायें अथवा स्त्री को हेय माना जाय। तात्पर्य तो कामवृत्ति के उन्मूलन से है। काम से घृणा कीजिए। परंतु किसी भी व्यक्ति से नहीं दिव्य-भाव बनाए रखिए।

ब्रह्मचारियों को पान, तम्बाखु, चाय, कॉफी आदि मादक वस्तुओं का सर्वथा त्याग करना चाहिए। तम्बाखु एक प्रकार का विष उत्पन्न करता है जिसके कारण शरीर में अनेक प्रकार के रोग दिल व आंखों के रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त कुछ अन्य नियम भी हैं जो ब्रह्मचारियों को पालन करने आवश्यक हैं।

भिक्षु के लिए उस स्थान में सोना मना है जिस स्थान में कोई स्त्री हो। भिक्षु किसी भी स्त्री को पांच या छः शब्द से अधिक शब्दों में उपदेश भी न दे, यदि वहां कोई सयाना पुरुष विद्यमान न हो। वह (भिक्षु) न तो किसी