भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य साधना

बहिन को शिक्षा ही दे और न किसी स्त्री के साथ कहीं यात्रा ही करे । जब वह भिक्षा लेने के लिये जाय तो अपने बसंतों को उचित रीति से ढाके रखले तथा चलते समय नजर सामने नीचे की ओर रखले, इधर उधर न देखे । उसे चाहिए कि वह जहां तक हो किसी भी स्त्री या बहिन से दिये हुआ वस्त्र अंगीकार न करे । कुल्लित विचार या कुवासना के साथ स्त्री के साथ बातचीत करना व उसका स्पर्श करना तो दूर रहा, वह (भिक्षु) स्त्री के साथ एकांत स्थान में बैठे ही नहीं ।

“पवित्र कुमारी समाज” की स्थापना महात्मा दूसरा द्वारा की गई थी । इसमें बालिकायें ३० वर्षों तक अविवाहित रहती थीं । ब्रह्मचर्य व्रत भंग के लिए सजीव (जिंदा) दफना देना ही उसका प्रायश्चित्त था । ये कुमारियां अपनी असाधारण शक्ति व आत्म प्रतिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थीं । साधारणतः राज (शाही) घराने के आदर के समान उनका आदर था । जब वे रास्ते में चलती थीं तो एक पहरेदार उनके आगे आगे चलता था तथा बड़े आँफिसरों को उन्हें रास्ता देना पड़ता था । कभी कभी गाड़ी में बैठकर चलने का भी उनको विशेष (असाधारण) अधिकार था । सार्वजनिक खेल तमाशों में भी उनके बैठने के लिए उच्च प्रतिष्ठित स्थान नियत किया जाता था । साधारण नित्यमें से परे होने के कारण, मरने के पश्चात् राजपरिजनों की नाहं वे शहर ही में दफनाई जाती थीं । दयालुता का शाही अधिकार भी उनको यहाँ तक था कि यदि कोई फांसी की सजा प्राप्त अपराधी उनको रास्ते में मिल जाता तो उसकी माफ़ हो जाती थी । और वह मुक्त कर दिया जाता था । बौद्धों के भिक्षु समाज के मोक्ष संबंधी (पतिमोक्ष)

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