ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचारियों के लिये नियम
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२२७ नियम थे ! इनमें से पहिले चार विशेष आवश्यक थे। यदि इनमें से किसी एक नियम का भी भंग हुआ, कि भिन्नक समाज से पृथक् (अलग) कर दिया जाता था। इसीलिये वे पराजित कहे जाते थे। जिन्होंने नियम खंडन किया वे पराजय प्राप्त करते थे।
पहिला नियम इस प्रकार है “कोई भी भिन्न (जिसने) एक बार आत्म-संशोधन तथा जीवन की नियम पद्धति को अपना लिया है और तत्पश्चात् अपने आपको उस से असंबंधित कर देने की घोषणा न की हो, यदि वह किसी भी प्राणी (इसमें पशु भी सम्मिलित हैं) के लैंगिक भोग विषयों का उपभोग करता हुआ प्रतीत होगा तो वह न्युत व पराजित समझा जायगा और समाज से उसका संबंध तोड़ दिया जायगा।” यदि कोई भिन्न किसी समय अपने आपको समाज से अलग कर, वस्त्र बदल कर पुनः संसारी बनने की इच्छा करता हो तो वह ऐसा करने के लिये भी स्वतन्त्र था।
दार्जिलिंग में जहां तिबत वालों की विशाल नई शस्ती है, उसमें सैकड़ों मजदूर-पेशा के व्यक्ति ऐसे थे जो ब्रह्मचर्य व्रत भंग करने तथा उस से मिलने वाले कड़े दंड से बचने के लिए अकेले या अपने यारों के साथ तिब्बत से भाग चले आये थे। ये सब भागकर आये हुये व्यक्ति बौद्ध भिन्न्यों से पृथक् समझे जाते थे। यदि कोई अपराधी पकड़ा गया तो उसको भारी अर्थ-दंड तथा आम जनता के समक्ष शारीरिक दंड दिया जाता है और वह कलंकित कर समाज से पृथक् कर दिया जाता है।
आपको सदा वह भाव रखना चाहिये कि सभी स्त्रियां उस आदि शक्ति जगद् जननी के ही न्यून रूप हैं। जैसे