भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

कि “दुर्गा सप्तशती” में आता है “विद्या समस्तास्तव देविमेदा, स्त्रियाः समस्ता सकला जगत्सु” आपको उनकी उपासना करनी चाहिये। यह अभ्यास नये साधक के लिए आत्मभाव (प्रत्येक वस्तु आत्मा है) की प्राप्ति वे लिए है। अन्यथा वह स्त्रियों से घृणा करना आरम्भ कर देगा और उनमें दिव्य प्रेम की बुद्धि नहीं होगी। उपर्युक्त अभ्यास कामवासना को दूर करने के लिये एक मानसिक उपचार है।

उक्त भाव की प्राप्ति बहुत कठिन है। “सब स्त्रियां आपकी मातायें और बहिन हैं” यह भाव व्यवहृत करने में आप १०१ बार असफल हो सकते हैं। इसकी परवाह नहीं। आप अपने अभ्यास पर दृढ़ रहिये। अन्त में आप को सफलता अवश्य प्राप्त होगी। आपको अपने पुराने मन को नष्ट कर एक नया मन बनाना पड़ेगा। हो न हो, आपको ऐसा करना ही पड़ेगा यदि आपको अमरत्व तथा नित्यानन्द प्राप्त करना है। यदि आप अपने संकल्प में दृढ़ है और अपने विचार के पक्के हैं, तो आप को सफलता अवश्य प्राप्त होगी। अभ्यास के द्वारा भाव शनैः शनैः व्यक्त होगा। आप शीघ्र उस भाव में स्थित हो जावोगे। अब आप निःसंकोच हैं।

पारम्परिक अभ्यासावस्थाओं में आपको चाहिए कि आप सदा स्त्रियों से दूर रहें। जब आप ब्रह्मचर्य में स्थित रहते हुए पूर्णरूप से सान्चे में ढल जाय तो फिर आप कुछ समय के लिए अपने बल के परीक्षार्थ, स्त्रियों के संग विचरण कर सकते हैं। तत्पश्चात् यदि मन आपका विशुद्ध हो गया है और आप शम, दम, उपरति के अभ्यास द्वारा अपने मन से लिंग (स्त्री-पुरुष) भाव को सर्वथा नष्ट कर