ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
बहिन को शिक्षा ही दे और न किसी स्त्री के साथ कहीं यात्रा ही करे । जब वह भिक्षा लेने के लिये जाय तो अपने बसंतों को उचित रीति से ढाके रखले तथा चलते समय नजर सामने नीचे की ओर रखले, इधर उधर न देखे । उसे चाहिए कि वह जहां तक हो किसी भी स्त्री या बहिन से दिये हुआ वस्त्र अंगीकार न करे । कुल्लित विचार या कुवासना के साथ स्त्री के साथ बातचीत करना व उसका स्पर्श करना तो दूर रहा, वह (भिक्षु) स्त्री के साथ एकांत स्थान में बैठे ही नहीं ।
“पवित्र कुमारी समाज” की स्थापना महात्मा दूसरा द्वारा की गई थी । इसमें बालिकायें ३० वर्षों तक अविवाहित रहती थीं । ब्रह्मचर्य व्रत भंग के लिए सजीव (जिंदा) दफना देना ही उसका प्रायश्चित्त था । ये कुमारियां अपनी असाधारण शक्ति व आत्म प्रतिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थीं । साधारणतः राज (शाही) घराने के आदर के समान उनका आदर था । जब वे रास्ते में चलती थीं तो एक पहरेदार उनके आगे आगे चलता था तथा बड़े आँफिसरों को उन्हें रास्ता देना पड़ता था । कभी कभी गाड़ी में बैठकर चलने का भी उनको विशेष (असाधारण) अधिकार था । सार्वजनिक खेल तमाशों में भी उनके बैठने के लिए उच्च प्रतिष्ठित स्थान नियत किया जाता था । साधारण नित्यमें से परे होने के कारण, मरने के पश्चात् राजपरिजनों की नाहं वे शहर ही में दफनाई जाती थीं । दयालुता का शाही अधिकार भी उनको यहाँ तक था कि यदि कोई फांसी की सजा प्राप्त अपराधी उनको रास्ते में मिल जाता तो उसकी माफ़ हो जाती थी । और वह मुक्त कर दिया जाता था । बौद्धों के भिक्षु समाज के मोक्ष संबंधी (पतिमोक्ष)
ब्रह्मचारियों के लिये नियम
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२२७ नियम थे ! इनमें से पहिले चार विशेष आवश्यक थे। यदि इनमें से किसी एक नियम का भी भंग हुआ, कि भिन्नक समाज से पृथक् (अलग) कर दिया जाता था। इसीलिये वे पराजित कहे जाते थे। जिन्होंने नियम खंडन किया वे पराजय प्राप्त करते थे।
पहिला नियम इस प्रकार है “कोई भी भिन्न (जिसने) एक बार आत्म-संशोधन तथा जीवन की नियम पद्धति को अपना लिया है और तत्पश्चात् अपने आपको उस से असंबंधित कर देने की घोषणा न की हो, यदि वह किसी भी प्राणी (इसमें पशु भी सम्मिलित हैं) के लैंगिक भोग विषयों का उपभोग करता हुआ प्रतीत होगा तो वह न्युत व पराजित समझा जायगा और समाज से उसका संबंध तोड़ दिया जायगा।” यदि कोई भिन्न किसी समय अपने आपको समाज से अलग कर, वस्त्र बदल कर पुनः संसारी बनने की इच्छा करता हो तो वह ऐसा करने के लिये भी स्वतन्त्र था।
दार्जिलिंग में जहां तिबत वालों की विशाल नई शस्ती है, उसमें सैकड़ों मजदूर-पेशा के व्यक्ति ऐसे थे जो ब्रह्मचर्य व्रत भंग करने तथा उस से मिलने वाले कड़े दंड से बचने के लिए अकेले या अपने यारों के साथ तिब्बत से भाग चले आये थे। ये सब भागकर आये हुये व्यक्ति बौद्ध भिन्न्यों से पृथक् समझे जाते थे। यदि कोई अपराधी पकड़ा गया तो उसको भारी अर्थ-दंड तथा आम जनता के समक्ष शारीरिक दंड दिया जाता है और वह कलंकित कर समाज से पृथक् कर दिया जाता है।
आपको सदा वह भाव रखना चाहिये कि सभी स्त्रियां उस आदि शक्ति जगद् जननी के ही न्यून रूप हैं। जैसे
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कि “दुर्गा सप्तशती” में आता है “विद्या समस्तास्तव देविमेदा, स्त्रियाः समस्ता सकला जगत्सु” आपको उनकी उपासना करनी चाहिये। यह अभ्यास नये साधक के लिए आत्मभाव (प्रत्येक वस्तु आत्मा है) की प्राप्ति वे लिए है। अन्यथा वह स्त्रियों से घृणा करना आरम्भ कर देगा और उनमें दिव्य प्रेम की बुद्धि नहीं होगी। उपर्युक्त अभ्यास कामवासना को दूर करने के लिये एक मानसिक उपचार है।
उक्त भाव की प्राप्ति बहुत कठिन है। “सब स्त्रियां आपकी मातायें और बहिन हैं” यह भाव व्यवहृत करने में आप १०१ बार असफल हो सकते हैं। इसकी परवाह नहीं। आप अपने अभ्यास पर दृढ़ रहिये। अन्त में आप को सफलता अवश्य प्राप्त होगी। आपको अपने पुराने मन को नष्ट कर एक नया मन बनाना पड़ेगा। हो न हो, आपको ऐसा करना ही पड़ेगा यदि आपको अमरत्व तथा नित्यानन्द प्राप्त करना है। यदि आप अपने संकल्प में दृढ़ है और अपने विचार के पक्के हैं, तो आप को सफलता अवश्य प्राप्त होगी। अभ्यास के द्वारा भाव शनैः शनैः व्यक्त होगा। आप शीघ्र उस भाव में स्थित हो जावोगे। अब आप निःसंकोच हैं।
पारम्परिक अभ्यासावस्थाओं में आपको चाहिए कि आप सदा स्त्रियों से दूर रहें। जब आप ब्रह्मचर्य में स्थित रहते हुए पूर्णरूप से सान्चे में ढल जाय तो फिर आप कुछ समय के लिए अपने बल के परीक्षार्थ, स्त्रियों के संग विचरण कर सकते हैं। तत्पश्चात् यदि मन आपका विशुद्ध हो गया है और आप शम, दम, उपरति के अभ्यास द्वारा अपने मन से लिंग (स्त्री-पुरुष) भाव को सर्वथा नष्ट कर
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चुके हैं, तो उस स्थित में आप यह कह सकते हैं कि आपने अपनी साधना में यथोचित उन्नति प्राप्त कर ली है। अब आप निश्चंक हैं। इस पर भी आपको अपनी साधना स्थगित (बंद) नहीं करनी चाहिये, यह जानते हुये कि आप एक जितेन्द्रिय योगी हैं। यदि आप अपना साधन-अभ्यास बंद कर देंगे तो आपका भारी अघोषित होगा। यदि आप जीवनमुक्त और शक्तिशाली योगी क्यों न हो, आपको चाहिए कि आप सांसारिक लोगों के साथ विचरण करते समय अत्यन्त सावधान रहें।
एक महात्मा जो अपने शिष्यों के द्वारा एक अन्तर माना जाता था, वह योग-ब्रह्म हो गया। वह भी स्त्रियों के साथ स्वतन्त्रता पूर्वक संसर्ग करते रहने के कारण, पतित हो गया। वह काम का शिकार बन गया। यह कैसा दुःख-मय दुर्भाग्य है। साधकगण अनेकानेक बड़ी बड़ी कठिनाइयों को पार करते हुए योगस्वी निश्चयिणी पर आरूढ़ होते हैं परन्तु वे अपनी असावधानी व आध्यात्मिक अहंकार के कारण इस प्रकार से पतित होते हैं कि फिर वे जीवन पर्यन्त भी ऊपर उठने में समर्थ नहीं होते।
वे साधक जो योग मार्ग में बहुत कुछ उन्नति कर चुके हैं, उन्हें, चाहिए कि वे बहुत सावधान रहें। वे स्वतन्त्रता पूर्वक स्त्रियों के साथ संसर्ग न करें। उनको मूर्खतावश यह नहीं समझना चाहिये कि वे योग में पूर्ण प्रवीण हो गये हैं। एक प्रसिद्ध संत महात्मा का अघोषित हो गया। वह स्वतन्त्रता पूर्वक स्त्रियों के साथ संसर्ग रखता और उन्हें अपनी चेलियाँ बनाई, जो उसके पैर तक दवाने लगीं। क्योंकि उसने अपने वीर्य को सर्वथा रूपांतरित कर श्रोत्र में परिणत नहीं किया था और चूंकि उसके मन
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में कामवासना सूक्ष्म रूप से छिपी हुई थी, वह काम का शिकार बन गया। उसने अपना सम्मान खो दिया। उसमें कामवासना केवल दबी हुई थी और जब उचित अवसर आया तो वह पुनः जाग्रत हो गई और अपना स्पर्श रूप धारण कर लिया। उसमें प्रलोभन का प्रतीकार करने के लिये के बल नहीं था और न उसकी इच्छा शक्ति ही प्रबल थी।
वह योगी जिसने उच्चतम निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर ली है और जिसमें संस्कारों के बीज संपूर्णतया भुन चुके हैं, वह पूर्ण ऊर्ध्वरेता योगी कहलाने का अधिकारी है यानी जितने पूर्णरूप से बीज को आज में बदल लिया है।
यह योगी जिसने, निरन्तर साधना, ध्यान, प्राशायाम, आत्मविचार, यम, नियम, शम, दम के अभास द्वारा, अपने आपको स्थित किया है, वह भी निःशंक है यद्यपि उसने ऊर्ध्वरेता की स्थिति प्राप्त नहीं की है। वह स्त्रियों द्वारा आकर्षित नहीं हो सकेगा। उसने अपने मन को कुसा (सूक्ष्म) कर डाला है। उसके मन का नाश हो चुका है। अब काम-वासना अपना मस्तक ऊपर नहीं उठा सकती। वह अब फूफकार भी नहीं सकती। वह योगी जिसने विशिष्ट ब्रह्मचर्य के द्वारा काम पर संपूर्ण विजय प्राप्त करली है, उसके लिए तो पतित होने का कुछ भी भय नहीं है। वह सर्वथा निःसंकोच है। वह अपवित्रता से सर्वथा मुक्त ही रहेगा। यह स्थिति बहुत ही ऊँची अवस्था है। इस विशिष्ट पवित्र अवस्था को केवल शंकर, दत्तात्रेय, ज्ञानदेव आदि चंद महत्माओं ने ही प्राप्ति की है।
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नवों अध्याय
हठयोग की प्रक्रियायें
(१) सिद्धासन
यह आसन ब्रह्मचर्य के अभ्यास के लिये श्रेष्ठ है। यह स्वप्नदोष को रोकने, काम पर विजय प्राप्त करने तथा ऊर्ध्ववरेता योगी बनने में सहायता प्रदान करता है। यह आसन जप, और ध्यान के लिये भी उपयोगी है।
बायें पैर की एड़ी को गुदा-स्थान पर रखिये। दूसरे पैर की एड़ी का जननेन्द्रिय के मूल भाग पर रखिये। दोनों
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पैर के टखने आपस में एक दूसरे से मिल जानें चाहिये। हाथों को घुटनों पर रख दीजिये। शरीर गर्दन और मस्तक को नीचा रखिये। पहले पहल आध घंटे तक बैठने का अभ्यास कीजिये और पुनः पुनः धीरे धीरे समय बढ़ाते हुये पूरे तीन घंटे तक बैठने का अभ्यास कीजिये। तीन घंटों तक लगातार एक आसन से बैठना ही आसन-जय कहलाता है।
(२) शीर्षासन
बल भि लकुल मीधे खड़े हो
यह सब आसनों का राजा है। इस आसन से होने वाले जो लाभ हैं, वे अकथनीय और अगणित हैं। यह मस्तिष्क व स्मरण-शक्ति को बढ़ाता है, ब्रह्मचर्य की रक्षा करता है तथा वीर्य को श्रोत्र में परिणत करता है।
समतल भूमि पर चौगुनी कंबल बिछा लीजिये। दोनों हाथों की अंगुलियों को तालीबंध कर लीजिये। अब अपने मस्तक के ऊपरी भाग को दोनों हाथों की बद्ध हथेलियों में रखिये। धीरे धीरे टांगों को ऊपर उठाते हुए शिर के जाड़ये। टांगों को थामने के
सर्वांगासन
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लिये आरम्भ में किसी दीवाल या अपने मित्र की सहायता लीजिये। कुछ अभ्यास के बाद आप स्वयं संतुलन (स्थिरता) प्राप्त करने में समर्थ होंगे। जब आसन कर चुकें तो टांगों को बहुत धीरे धीरे नीचे ले आइये। आसन करते समय केवल नाक के द्वारा स्वांस लीजिये। अनियमित रूप से कुम्भक, रेचक और पूरक करने से आसन में अस्थिरता आ जायगी।
इस आसन का अभ्यास खाली पेट करना चाहिए। इस आसन के द्वारा पेट के, आंतों के, फेफड़े के, हृदय के, गुर्दा के, कानों के, आंखों के तथा मूत्र संबंधी अनेकानेक
पुराने असाध्य रोग नष्ट होते हैं।
आसन करते समय यदि आपकी टांगें हिलती हों तो कुछ समय के लिये स्वांस को रोकिये; टांगों में स्थिरता आजायगी।
(३) सर्वांगासन
यह भी एक परमावश्यक आसन है। यह भी ब्रह्मचर्य की रक्षा करने, आयु को दीर्घ बनाने, भूत व पाच न शक्ति को बढ़ाने तथा थाइ-रोइड (Thyroid) को कुशलता पूर्वक चालू रखने में सहायता प्रदान
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करता है। इस आसन के अभ्यास से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है तथा चेहरे पर सुन्दरता व श्रोज झलकने लगता है।
अभ्यास कीजिये और उसका प्रभाव प्रत्यक्ष अनुभव कीजिये। शीर्षासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तान आसन, और मयूरासन मुझे अत्यन्त प्रिय है। मैं अपने सभी विद्यार्थियों को इनका अभ्यास करने की शिक्षा देता हूँ।
भूमि पर कंबल बिछा लीजिये। कमर के बल सीधे चिन्ह लम्ब जाइये। धीरे धीरे टांगों को ऊपर उठाइये। धड़ और जंशाओं को भी ऊपर उठाइये। दोनों ओर से हाथों के सहारे कमर को थामे रहिये। अब सारा शरीर का भार आपके कंधों व केंदुनियों पर रहेगा। टांगों को स्थिर रखिये। टुट्टी को छाती की ओर हटता पूर्वक दबाये रखिये। केवल नासिका द्वारा धीरे धीरे स्वांस लीजिये। पांच मिनट से आरम्भ कीजिये और फिर धीरे धीरे जितना हो सके समय बढ़ाइये।
(४) मस्त्यासन
मत्स्यासन
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सर्वांगासन के पश्चात् तुरत मत्स्यासन करना चाहिए। सर्वांगासन से गर्दन व तत्संबंधी भागों में जो ऐंठन या रूखापन आ जाता है उसे यह आसन दूर कर देता है। इसके गर्दन तथा कंधों के संकुचित भागों को एक प्रकार से अन्च्छी हल्की सी मालिश हो जाती है। इसके अतिरिक्त इस आसन से प्रायः वे सभी लाभ प्राप्त हो जाते हैं जो सर्वांगासन से होते हैं।
दाये पैर को बाईं जंघा पर तथा बांये पैर को दाहिनी जंघा पर रखकर बैठ जाइये। अब कमर के बल चित्त लेट जाइये। मस्तक को इस प्रकार फैलाइये कि उसका ऊपरी भाग पृथ्वी पर दृढ़ता पूर्वक सटा रहे और उधर नीचे की ओर आपके दोनों चूतड़ (नितंब) भी जमीन से सटे रहें; कमर जमीन से ऊपर उठी हुई रहनी चाहिये ताकि एक प्रकार का पुल बन जाय। अब दोनों हाथों को जंघाओं पर रख दीजिये या पैरों के अंगुटों को हाथों से पकड़ लीजिये। यह मत्स्यासन अनेक रोगों का नाश करने वाला है। यह आसन साधारण स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है।
(५) पादगुप्तासन
पंजों के बल बांये पैर को ऊपर उठाकर उसकी ऐँड़ी को गुदा के ठीक बीचों बीच रखिए। शरीर का सारा भार पंजों पर रहना चाहिये। दाहिने पैर को बाईं जंघा के ऊपर घुटने के पास रखिये। हाथों को चूतरों पर रख संतुलित होकर सावधानी से बैठिये। धीरे धीरे स्वांस लीजिये। इस आसन को अपने आप करने में यदि आपको कठिनाई मालूम हो तो आप इसको किसी बेंच या दीवाल के सहारे बैठकर कर सकते हैं।
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गुदा स्थान की चौड़ाई केवल चार इंच है। इसी स्थान के नीचे वीर्य नाड़ी रहती है जिसके द्वारा वीर्य अंडकों में पहुँचता है। इस नाड़ी पर एड़ी का दबाव पड़ने से वीर्य का बाहरी प्रवाह रुक जाता है। इस आसन का दृढ़ अभ्यास करने से स्वप्नदोष मिटता है तथा साधक ऊर्ध्व रेता योगी बन जाता है। शीर्षासन, सर्वांगासन और सिद्धासन का संयुक्त प्रयोग ब्रह्मचर्य के लिये अत्यन्त लाभदायक है। प्रत्येक का अपना विशेष कार्य है। सिद्धासन अंडकोष और तत्संबंधी भागों पर प्रभाव डालता है तथा वीर्य की उत्पत्ति को रोकता है। शीर्षासन और सर्वांगासन वीर्य को ऊपर मस्तिष्क की ओर ले जाने में सहायता प्रदान करते हैं। पादांगुष्ठ्यासन शुक्र संबंधी नाड़ी पर पूर्ण प्रभाव डालता है।
आसन संबंधी सूचनायें
शारीरिक व्यायामों से प्राण बाहर की जाते हैं और आसनों के अभ्यास से प्राण अन्दर जाते हैं। आसन शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के बलों को बढ़ाने वाले हैं।
आसनों के द्वारा इन्द्रियां मन और शरीर सभी नियन्त्रित किये जा सकते हैं। इनसे शरीर, नाड़ियां और पुष्टि शुद्ध होते हैं। यदि आप डंड बैठकों का अभ्यास पांच सौ प्रति दिन की दर से पांच वर्षों तक भी करें तो भी आपको आध्यात्मिक अनुभव कुछ भी नहीं प्राप्त हो सकते। साधारण शारीरिक व्यायाम केवल शरीर के वायु पुष्टों (अंगों) को ही पुष्ट करते हैं। शारीरिक व्यायामों के द्वारा मनुष्य एक सुन्दर डील डोल वाला सेंडो (पहलवान) बन सकता है। परन्तु आसनों से शारीरिक तथा आध्या-
आसन संबंधी सूचनायें
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स्मिक दोनों प्रकार के बल की वृद्धि होती है।
फर्श पर कंबल बिछाकर उस पर आसनों का अभ्यास करना चाहिये। शीर्षासन करते समय शिर के नीचे तकिया रखना चाहिये। आसन करते समय कौपीन (लंगोट) पहिने रहिये। चश्मा (पैन्क) उतार दीजिये और अधिक वस्त्र भी शरीर पर न रखिये।
जो लोग शीर्षासन का अभ्यास अधिक समय तक करते हैं, उनको आसन समाप्ति के पश्चात् कुछ जल-पान (कलेवा) कर लेना चाहिये अथवा कुछ दूध पी लेना चाहिए। आसनों का अभ्यास यथा-क्रम नियम-नियमानुसार करना चाहिये। जो कभी कभी अभ्यास करते हैं, उन्हें कुछ भी लाभ नहीं होता। यदि कोई आसनों का यथेच्छ लाभ उठाना चाहे, तो उसके लिये नियमित अभ्यास की परमावश्यकता है। साधारणतया लोग आरंभ में मास दो मास तक तो बड़े कौतूहल व उत्साह के साथ अभ्यास करते हैं और फिर अभ्यास छोड़ देते हैं। यह उनकी भारी भूल है।
आसनों का अभ्यास खाली पेट से करना चाहिये या खाना खाने के कम से कम तीन घंटे पश्चात्। आसनों का अभ्यास करते समय आप जप और प्राणायाम को भी सुविधा सहित भिला सकते हैं। उस स्थिति में वह वास्तविक योग बन जाता है। आसनों का अभ्यास खुली हवा में, समुद्र तट पर या नदी के किनारे बालू रेत पर करना उपयुक्त है। यदि आप आसन और प्राणायाम का अभ्यास किसी कमरे में करते हैं तो आपको देखना चाहिये कि कमरा संकुचित तो नहीं है। कमरा स्वच्छ और एवादार होना चाहिये।
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आरम्भ में आसन का अभ्यास केवल एक या दो मिनट के लिये ही कीजिये और पुनः शनैः शनैः जितना हो सके, समय बढ़ाते जाइये। जब आप सभी योगिक क्रियाओं का अभ्यास करते हैं तो आप को सजग रहना चाहिये कहीं अत्यधिक परिश्रम न हो। हर समय प्रसन्नता और आनन्द रहना चाहिये।
संसार में जितने जीवधारी प्राणियों की जातियाँ हैं, उतने ही आसन हैं। यहाँ मैंने आपको कुछ सुने हुये आसनों के संबंध में शिक्षाएँ दी हैं, जो ब्रह्मचर्य के लिये परम उपयोगी है।
दन्व त्रय
बन्ध त्रय
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(६) मूल बन्ध
बाये पैर की एडी से योनि के दबाइये। गुदा को सिकोड़िये। दाहिने पैर की ऐंडी को सिगोन्द्रिय के मूल में रखिये। यह मूल बन्ध है। साधारणतया यह प्राणायाम करते समय किया जाता है।
(७) जालन्धर बन्ध
कंठ को सिकोड़िये। उदृढ़ी को हृदतापूर्वक छाती से सटा दीजिये। इसका अभ्यास पूरक के अन्त में और कुम्भक के आरम्भ में करना चाहिये। इसके पश्चात् उड़ियान बन्ध करना चाहिये। ये बन्ध एक प्रकार से एक ही प्रयोग के तीन रूप हैं।
(८) उड़ियान बंध
मस्तक को ऊपर उठाइये। रेचक कीजिये और उदर को इस प्रकार अन्दर खींचिये कि वह वक्षस्थल की गुहा से जा लगे। इस बंध का अभ्यास खड़े खड़े किया जा सकता है। इस स्थिति में टाँगों को कुछ चौड़ी कर हाथों को नंधाओं पर रख कर कुछ आगे की ओर नीचे झुक जाइये। इन तीनों (मूल, जालन्धर, उड़ियान) बन्धों का एक अन्ध्या समन्वय है।
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(६) नौली किया
उड़ियान बंध बैठे बैठे किया जा सकता है, परन्तु नौली साधारणतया खड़ा होकर की जाती है। दोनों पैरों के बीच में एक फुट का फासला रख कर खड़े रहिये। हाथों को जंघाओं पर रखते हुए कमर को कुछ सामने की ओर नीचे झुका दीजिये। फिर उड़ियान बन्द कीजिये। अब पेट के गोल को पेट की दाई ओर बाई ओर इधर उधर घुमाइये। आपके सब पुछे लंब रूप में रहेंगे। सुख पूर्वक जितनी देर हो सके उतनी देर तक ऐसा कीजिये। कुछ दिनों तक इस प्रकार अभ्यास कीजिये।
इस प्रकार कुछ अभ्यास कर लेने के पश्चात् आप
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महामुद्रा
पेट की दाहिनी बगल (ओर) को सिकोड़े रखिये और बांई बगल को मुक्त कीजिये पुनः बांई बगल को सिकोड़िये और दांई को मुक्त कीजिये। इस प्रकार शनैः शनैः अभ्यास करते हुये आप स्वयं जानने लगेंगे कि पेट के बीच के तथा दांई बांई ओर के पुट्ठे किस प्रकार सिकोड़े जाने चाहिये॥
अब नौली क्रिया की अन्तिम स्थिति आती है। पुट्ठों को बीच में रखिये। धीरे धीरे दांई ओर लाइये और फिर गोलाकार रूप में बाईं ओर ले जाइये। इस प्रकार दांई से बाईं और बाईं से दाईं ओर कई बार कीजिये। आपको चाहिये कि आप इन पुट्ठों को गोलाकार चाल से सदा धीरे धीरे चलावें। यदि आप क्रिया को शनैः शनैः सावधानी के साथ करेंगे तो आपको पूर्ण लाभ होगा। नये साधकों को आरंभ के दो या तीन अभ्यासों में पेट में कुछ दर्द प्रतीत हो सकता है। परन्तु उन्हें भयभीत नहीं होना चाहिये। दो या तीन दिनों के नियमित अभ्यास के बाद दर्द नहीं प्रतीत होगा।
(१०) महामुद्रा
भूमि पर बैठ जाइये। बांई एड़ी से गुदा को दबाइये दाहिने पांव को फैला दीजिये। दोनों हाथों से अंगुष्ठ को पकड़ लीजिये। पूरक करके कुम्भक कीजिए। ठुड्डी
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को दृढ़ता पूर्वक छाती से लगा लीजिए। भुंकुटी पर दृष्टि जमाइए। जितना हो सके उतनी देर तक इस स्थिति में रहिए। इसी प्रकार अन्य पांख पर भी अभ्यास कीजिए।
(११) योगमुद्रा
पद्मासन लगाकर बैठ जाइए। हथेलियों को ऐंड़ियों पर रख दीजिए। धीरे धीरे स्वांस बाहर निकालिए और सामने मुड़ते जाइए और मस्तक को भूमि से छूने दीजिए। यदि आर इस स्थिति में अधिक समय तक रहें तो साधारण रीति से स्वांस ले सकते हैं। यदि अधिक समय तक उस स्थिति में न रहें तो स्वांस को रोके रहिए जब तक आप धीरे धीरे मस्तक उठाते हुए अपनी साधारण स्थिति में न आ जायें; तब तक स्वांस पहली हालत में आकर स्वांस लीजिए। हाथों को ऐंड़ियों पर न रख कर आप उन्हें अपनी पीठ के पीछे लेजा कर, दाहिने हाथ से बाये हाथ की कलाई भी पकड़ सकते हैं। यह मुद्रा ब्रह्मचर्य के लिए लाभदायक है। इस मुद्रा से पेट का और अस्थायिक मोटापन कम होता है। तथा पेट और आंतों के सब प्रकार के रोग नष्ट होते हैं। जठराग्नि प्रबल होती है। भूल और पाचन शक्ति बढ़ती।
(१२) सरल सुखपूर्वक प्राणायाम
अपने ध्यान के कमरे में, खाली पेट पद्मासन लगा कर बैठ जाइये। आर्यों बन्द कर लीजिए। दाहिने हाथ के अंगुष्ठ के द्वारा दाहिनी नासिका को बंद कर लीजिये और बाईं नासिका के द्वारा धीरे धीरे वायु को भीतर खींचिए। अब दाहिने हाथ की अनामिका और कतिष्का अंगुलियों द्वारा बाये नासा-द्वार को बंद कर दीजिए। स्वांस को जितनी देर रोक सकें भीतर रोके रहिए। फिर
भक्तिका प्राणायाम
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दाहिने ग्रंणुष्ठ को हटा लीजिए और बहुत धीरे धीरे स्वांस बाहर निकालिए। इसी प्रकार पुनः दाहिने नासा-द्वार के द्वारा वायु को अन्दर खींचिए; जितनी देर रोक सकें अन्दर रोके रखिए फिर बांये द्वार से धीरे धीरे बाहर निकाल दें। यह सारा क्रम एक प्राणायाम कहलाना है। इस प्रकार २० प्राणायाम प्रातः और २० सार्धकाल में कीजिए। धीरे धीरे स्वांस रोकने के समय को मावधानी सहित बढ़ाइए; साथ ही प्राणायामों की संख्या को भी बढ़ाने का प्रयत्न कीजिए। जब आपको श्रद्धा अभ्यास हो जाय तो आप दिन में तीन या चार बार प्राणायाम कर सकते तथा प्राणायामों की संख्या भी एक बैठक में ८० तक बढ़ा सकते हैं।
नोटः—हाथ के ग्रंणुष्ठ के पास वाली ग्रंणुली को तर्जनी, उसके पास वाली यानी चिन्हली ग्रंणुली को मध्यमा उसके पास वाली को अनामिका तथा उसके पास वाली ग्रंणुली को कनिष्ठका कहते हैं।
(१३) भक्तिका प्राणायाम
प्रासन से बैठ जाइये। शरीर को सीधा खड़ा रखिये। मुँह बंद कर लीजिए। धीँकनी की नाई बीस बार तक खूब जोर जोर से पूरक और रेचक कीजिए। बीस पूरे होने पर फिर गहरी स्वांस लीजिए और धीरे धीरे बाहर निकालिये। यह एक चक्र है। योद्धा अवकाश लीजिए और फिर दूसरा चक्र कीजिए। तीन चक्र प्रातः और तीन चक्र सार्धकाल में कीजिये। यह बहुत शक्तिशाली अभ्यास है। ब्रह्मचर्य के लिए परम उपयोगी है। इस प्राणायाम को खड़े खड़े भी कर सकते हैं।
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(१४) प्राणायाम के संबंध में साधारण संकेत प्राणायाम के अभ्यास के पश्चात् तुरंत स्नान नहीं करना चाहिये। आद्य घंटे तक ठहर कर फिर नहाना चाहिये। शीघ्र ऋतु में केवल एक ही बार मातृकाल में प्राणायाम करें। यदि मस्तिष्क में कुछ ताप मालूम हो तो नहाने के पहिले शिर पर ठंडा तेल मसिये।
पूरक और रेचक सदा धीरे धीरे करने चाहिये। पूरक करते समय कुछ भी शब्द नहीं होना चाहिये। भक्षिका में भी जो शब्द हो, वह तीव्र होना चाहिये। केशल नासिका द्वारा ही स्वांस लेना चाहिये। नये साधक को कुछ दिनों के लिये बिना कुम्भक का केवल पूरक और रेचक ही करना चाहिये।
प्राणायाम करते समय पूरक, कुम्भक और रेचक इस त्वरी से करना चाहिये कि आपको किसी भी स्थिति में कुछ भी पीड़ा या स्वासावरोधन न हो। रेचक का समय आपको आवश्यकता से अधिक नहीं बढ़ाना चाहिये। यदि आप ऐसा करते हैं तो आपका श्रमला पूरक शीघ्रता पूर्वक होगा और आपका लय या ताल भंग हो जायगा।
कुम्भक का समय शनैः शनैः बढ़ाहये। प्रथम सप्ताह में चार सेकेंड, दूसरे सप्ताह में द सेकेंड और तीसरे सप्ताह में १२ सेकेंड के लिये कुम्भक कीजिये; इसी प्रकार जितना हो सके, समय बढ़ाते जाहये।
प्राणायाम करते समय ८% मंत्र का, गायत्री मंत्र का अथवा किसी भी अन्य मंत्र का मानसिक जप कीजिये। ऐसा भाव रखिये कि पूरक करते समय करुणा, क्षमा, प्रेम आदि सद्गुण आप में प्रवेश कर रहे हैं तथा रेचक करते समय आपके काम, कोष, द्वेष, लोभ आदि दुष्ट गुणों
अन्य प्रकार
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का क्षय हो रहा है। पूरक करते समय आप ऐसी भावना कीजिये कि आप लौकिक प्राण से शक्ति प्राप्त कर रहे हैं तथा आपका सारा शरीर अगाध, स्वच्छ प्राण शक्ति से परिपूर्ण हो रहा है। विशेष अस्वस्थ अवस्था में अभ्यास बन्द कर दीजिये।
(१५) अन्य प्रकार
सत्संग, आहार संबन्धी नियम, मिताहार, सात्विक भोजन, व्रत, दृष्टि परिवर्तन आदि उपरोक्त सभी बातें, हठ-योग, भक्तियोग, राजयोग और ज्ञानयोग के सभी विद्यार्थियों के लिये सामान्य रूप से लागू हैं। ब्रह्मचर्य संबन्धी आवश्यक हठयोगिक अभ्यास पहिले बताये जा चुके हैं।
नवधा भक्ति (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म निवेदन) के अभ्यास के द्वारा भक्त अपनी अशुद्ध भावनाओं का दमन कर अपने मन को सगुण ब्रह्म पर एकाग्र कर सकता है। भगवान की लीला या कथा का सुनना या शान्तों का अध्ययन करना श्रवण भक्ति है। भगवान के नाम का निरन्तर जप करना तथा उसका निरन्तर स्मरण करना, स्मरण भक्ति कहलाती है। भगवान के यश का गान करना, कीर्तन है। पत्र-पुष्पादि भेंट चढ़ाना, अर्चन है। भगवान के चरण कमलों की पूजा करना, पादसेवन है। भगवान से मित्रता करना, सख्य है। भगवान की निस्वार्थ भाव से सेवा करना, दास्य है। आत्म समर्पण ही आत्म निवेदन है। व्रत, अनुष्ठान, प्रार्थनायें, मानसिक पूजा, मर्मग्राह्य आदि के द्वारा भक्त काम, क्रोध व अन्य अशुद्ध वामनाओं से मुक्त होकर नित्य शान्ति, आनन्द और ज्ञान के पथ पर चल सकता है।