ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
में कामवासना सूक्ष्म रूप से छिपी हुई थी, वह काम का शिकार बन गया। उसने अपना सम्मान खो दिया। उसमें कामवासना केवल दबी हुई थी और जब उचित अवसर आया तो वह पुनः जाग्रत हो गई और अपना स्पर्श रूप धारण कर लिया। उसमें प्रलोभन का प्रतीकार करने के लिये के बल नहीं था और न उसकी इच्छा शक्ति ही प्रबल थी।
वह योगी जिसने उच्चतम निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर ली है और जिसमें संस्कारों के बीज संपूर्णतया भुन चुके हैं, वह पूर्ण ऊर्ध्वरेता योगी कहलाने का अधिकारी है यानी जितने पूर्णरूप से बीज को आज में बदल लिया है।
यह योगी जिसने, निरन्तर साधना, ध्यान, प्राशायाम, आत्मविचार, यम, नियम, शम, दम के अभास द्वारा, अपने आपको स्थित किया है, वह भी निःशंक है यद्यपि उसने ऊर्ध्वरेता की स्थिति प्राप्त नहीं की है। वह स्त्रियों द्वारा आकर्षित नहीं हो सकेगा। उसने अपने मन को कुसा (सूक्ष्म) कर डाला है। उसके मन का नाश हो चुका है। अब काम-वासना अपना मस्तक ऊपर नहीं उठा सकती। वह अब फूफकार भी नहीं सकती। वह योगी जिसने विशिष्ट ब्रह्मचर्य के द्वारा काम पर संपूर्ण विजय प्राप्त करली है, उसके लिए तो पतित होने का कुछ भी भय नहीं है। वह सर्वथा निःसंकोच है। वह अपवित्रता से सर्वथा मुक्त ही रहेगा। यह स्थिति बहुत ही ऊँची अवस्था है। इस विशिष्ट पवित्र अवस्था को केवल शंकर, दत्तात्रेय, ज्ञानदेव आदि चंद महत्माओं ने ही प्राप्ति की है।
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