ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
में कुछ विवेक उत्पन्न हुआ है, वह नित्य सोचता रहता है “मैं कब अपनी स्त्री के पंजों से मुक्त होकर भगवत् चिंतन के लिये बनगामी होऊंगा ?” इस मत भेद पर अब आप स्वयं विचार कर सकते हैं।
सदाचार ब्रह्मचर्य का ही तत्सम्बन्धी शब्द है। वह मनुष्य जो एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य वृत्ति रखता है परन्तु जो दो या तीन वर्षों में कभी कभी स्त्री प्रसंग करता है, उस मनुष्य से अधिक सदाचारी समझा जाता है जो नित्य अपनी विवाहिता स्त्री के साथ प्रसंग करता है। वह मनुष्य जो नित्य कामुक विचारों में ही निमग्न रहता है सब से अधिक दुराचारी है। परन्तु अज्ञानी मूर्ख सांसारिक लोग सदाचार के सिद्धांत को अपने ही दृष्टिकोण से समझते हैं तथा केवल बाहरी स्थितियों की ओर ही ध्यान देते हैं न कि आंतरिक मानसिक स्थिति की ओर।
यदि आप कामुक विचारों पर अधिकार नहीं जमा सकते तो कम से कम स्थूल शरीर पर तो अधिकार रखिये। भरसक साधना कीजिये। एक दिन वह भी आ जायगा जब कि आप कामुक विचारों से सर्वथा मुक्त हो जायेंगे। यह आपके लिए एक कड़ा युद्ध है। परन्तु ऐ मेरे प्यारे मित्रों! आपको यह करना ही पड़ेगा, यदि आप नित्य शांति और अमर जीवन प्राप्त करना चाहते हैं।
कामुक विचार को दबा देने से विशेष काम नहीं चलेगा। उचित अवसर प्राप्त होने पर जब आप की इच्छा शक्ति कमजोर हो जायगी, जब वैराग्य क्षीण हो जायगा, जब ध्यान मा यौगिक साधना में शिथिलता आजायगी, जब किसी रोगाक्रमण से आप दुर्बल हो जायेंगे, तो वह स्त्री पूर्व कामवासना द्विगुणी शक्ति के साथ पुनः प्रकट