भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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विशेष उपदेश

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हो जायगी। जप, प्रार्थना, ध्यान, धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन, प्राणायाम, आसन आदि के अभ्यास द्वारा काम-शक्ति को ओज-शक्ति में परिणत करनी चाहिए। आपको भक्ति तथा मुमुक्षुत्व की वृद्धि करनी चाहिए। आप शुद्ध, अमर, अलिंग, अनंग, अनिच्छित् आत्मा का निरन्तर ध्यान कीजिए। केवल तब ही आप की काम वासना समूल नष्ट हो सकती है।

जो लोग ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते हैं, उनकी ओर से यह आम शिकायत है कि उन्हें इन्द्रिय दमन के कारण मानसिक बाधा होती है। यह केवल मन का कपट (छल) है। कभी कभी आप का मिथ्या भूल लगती है और उस हिप्ति में जब आप भोजन करने के लिए बैठते हैं तो आपको वास्तविक उत्तम भूल नहीं होती और आप खाना नहीं खाते। ठीक उसी प्रकार की यह आपकी मानसिक बाधा भी है। यदि आप ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे तो आपको अपार मानसिक बल की प्राप्ति होगी। आप हर समय उसका अनुभव नहीं कर सकेंगे। जिस प्रकार एक पहलवान अखाड़े में अपने शारीरिक बल को प्रकट करता है (यद्यपि साधारण समय में वह एक साधारण मनुष्य प्रतीत होता है) ठीक उसी प्रकार आप भी अपने उस मानसिक बल को अवसर उपस्थित होने पर प्रकट करेंगे।

योगिक क्रियायें सीखने में आपका उद्देश्य शुद्ध होना चाहिए। योगिक क्रियायें और ब्रह्मचर्य के द्वारा केवल आत्म साक्षात्कार करने का ही आपका एक मात्र विचार होना चाहिए। लिंग-शक्ति का रूपांतरण प्राप्त कीजिए। इसके द्वारा जो आपको शक्ति प्राप्त हो उसका दुःखयोग न कीजिए। अपने उद्देश्य का पूर्णतया विश्लेषण कीजिये।