भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

६८

ब्रह्मचर्य साधना

कामवासनां धीरे धीरे दूर हो जायगी। स्त्रियों से दूर भागने का प्रयत्न न कीजिए। ऐसा करने से माया और भी अधिक बल के साथ आपका पीड़ा करेगी। सब रूपों में आत्मा को देखने का प्रयत्न कीजिए तथा “ॐ एक सच्चिदानन्द आत्मा” इस मंत्र का बार बार रटन करते रहिये। आत्मा को अलिंग समझते हुए उक्त सूत्र का निरन्तर चिंतन करते रहने से आपमें बल की प्राप्ति होगी।

प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह शुद्ध आत्मा तथा अशुद्ध अनात्मा (शरीर) का विवेक (विचार) प्राप्त करने का प्रयत्न करे। उसे चाहिए कि वह स्त्री और पुंष सम्बन्धी जीवन से उत्पन्न होने वाले जो निम्न लिखित दोष हैं, उनसे सदा अपने मन को परिचित करता रहे— शक्ति का हास, इन्द्रियों की दुर्बलता, शारीरिक राग, जन्म और मृत्यु, आसक्ति तथा शरीर के विभिन्न पदार्थों जैसे मांस, रक्त, हड्डी, मल, मूत्र, पस, बलगम आदि के विषय में अनेक प्रकार की चिंता। उसे चाहिए कि वह शुद्ध अमर आत्मा तथा आध्यात्मिक जीवन (अमरत्व, निश्चानन्द और परम शान्ति की प्राप्ति) के महत्त्व को सदा ध्यान में रखे। धीरे धीरे मन स्त्री को और देखने से विरक्त हो जायगा चाहे वह कैसी ही ब्राह्मण कन्या न हो। मन उस को कुछछि से देखने में धृष्टा करने लगेगा। स्त्रियों को भी चाहिए कि वे भी अपने आपको ब्रह्मचर्य में स्थित रखने के लिए उपयुक्त अभ्यासों का अनुसरण करें।

(ब) योगियों और भक्तों का संयुक्त विधान जप (भगवान के नाम का रटन) शीर्षारुन, सर्वोग- सन्, ाद अंगुष्ठारुन, प्राशायाम, सत्संग, गीता, रामायण