ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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जबन्धन साधना
का त्याग कीजिये । ईश्वर-साक्षात्कार के लिए एक ही तीव्र इच्छा के द्वारा इन शुभेच्छाओं का भी त्याग कर दालिये । अन्त में पुनः इस भगवत् प्राप्ति की इच्छा का भी त्याग कर दीजिये । यह ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार कि एक काटे को दूसरे काटे से निकाल कर पुनः दोनों काटों को फँक देना । यह रीति अत्यन्त सरल है ।
जब वासना दूर हो जाती है तो इच्छा शक्ति बढ़ती है । यदि आपने पाँच वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली तो आपके लिए छठी वासना पर विजय प्राप्त करना अत्यंत सरल होगा, क्योंकि आप में अधिकाधिक शक्ति का संचार हो रहा है आप इसका वास्तव में अनुभव कर सकते हैं । वासनाओं के नाश का अर्थ मनोनाश से ही है । मन, वासनाओं के समूह के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं ।
अधिकांश मनुष्यों में मैथुन की लालसा अत्यन्त तीव्र रहती है । उनमें यह इच्छा पूर्ण रूप से विद्यमान रहती है । कुछ मनुष्यों में काम-वासना कभी कभी उत्पन्न होती है, परन्तु शीघ्र ही नष्ट हो जाती हैं । केवल मन में थोड़ा उद्वेग प्रतीत होता है । उचित प्रकार की आध्यात्मिक साधना के द्वारा यह भी सर्वथा नष्ट किया जा सकता है ।
उत्पत्ति का बीज (कारण) तृष्णा है ! इन तृष्णाओं से संकल्प-और कर्म उत्पन्न होते हैं । इन्हीं से संसार चक्र चलता रहता है । तृष्णायें मन को उत्तेजित करती हैं और आप कामी बन जाते हैं । मुनि वाल्मीकि योग वाशिष्ठ में लिखते हैं “आप अखिल समुद्र का पान कर सकते हैं । आप अग्नि को निगल सकते हैं । आप हिमालय पर्वत को अपने हाथ में धारण कर सकते हैं । परन्तु वासनाओं को