भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

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मनुष्य देह की दुर्लभता

मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है - भगवत्प्राप्ति अर्थात् महासुख में निमग्न होना । इसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए प्रभु ने अहंता की कृपा-करुणा करके यह देवदुर्लभ अर्थात् 'भव अज कठिन मुनीजन दुर्लभ' मानव देह हमें दिया है - 'कबहुँक करि करना नर देही । देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥' ऐसा सभी शास्त्रों का कथन एवं समस्त संत-महापुरुषों का अनुभव रहा है । श्रीमद्भागवत में महाराज निमि (जनकजी) नवयोगेश्वरों के समक्ष कह रहे हैं -

दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः । (११/२/२९)

'मनुष्य शरीर की प्राप्ति बड़ी दुर्लभ है, यदि प्राप्त भी हो जाए तो यह क्षणभंगुर है ।' जगद्वर आद्यशंकराचार्य जी भी कहते हैं -

दुर्लभं त्रयमेवैतद् देवानुग्रहहेतुकम् ।

मनुष्यत्वं मुमुक्षत्वं महापुरुषसंश्रयः ॥ (विवेक चूड़ामणि)

'तीन चीजें बड़ी दुर्लभ हैं - मनुष्य जन्म, मुमुक्षता अर्थात् मुक्ति की इच्छा और महापुरुषों का संग; यह तीनों चीजें प्रभु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं ।' श्रीसूरदास प्रभृति महापुरुष भी लिखते हैं -

हरि! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों ।

साधन-धाम बिबुध दुरलभ तनु, मोहि कृपा करि दीन्हों ॥

अतः बड़ी कठिनाई से प्राप्त होने के बाद भी ये नरदेह क्षणभंगुर है अर्थात् किसी को पता नहीं है, किस क्षण हमारे शरीर में कौन-सी भयानक घटना घटेगी और यह अमूल्य मनुष्य जीवन समाप्त हो जायेगा । इसीलिये श्रीप्रह्लाद जी महाराज ने असुर बालकों को शिक्षा देते हुए कहा है -

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