भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

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कौमार आचरेत्प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह ।

दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्वुवमर्थदम् ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता ७/६/१)

‘इस लोक में बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह कुमारावस्था से ही भजन परायण हो जाये; क्योंकि सर्वविध पुरुषार्थों की प्राप्ति कराने वाला मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है, तथा प्राप्त होने पर भी क्षणभंगुर है यानी किस समय मृत्यु आ जाए किसी को पता नहीं ।’

इसीलिये अभी जो समय मिला है, इसी में हमें प्रतिक्षण सावधान होकर इस दुर्लभ शरीर से परमलाभ प्राप्त करने के लिये पूर्ण प्रयत्नशील रहना है और ऐसे मलिन कर्म नहीं करने हैं कि जिनसे कर्म-बंधन से युक्त होकर के नाना प्रकार की कुत्सित योनियों में भटककर नाना प्रकार के दुःख (कष्ट) भोगने पड़ें । भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवत् के एकादश स्कंध में श्रीउद्धवजी से कह रहे हैं -

एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् ।

यत् सत्यमनूतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम् ॥ (११/२९/२२)

‘हे उद्धव! विवेकियों का विवेक और चतुरों की चतुराई यही है कि वे इस विनाशी एवं असत्य शरीर के द्वारा मुझ अविनाशी एवं सत्यतत्त्व को प्राप्त कर लें ।’

यह मनुष्य जीवन विषयासक्ति से युक्त होकर बंधन में आने के लिए नहीं बल्कि बन्धन से मुक्त होने के लिये है ।

श्रुतियों में लिखा है कि असत् से सत् की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर चलने के लिए यह शरीर मिला है -

असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय,

मृत्योर्मामृतं गमय ॥ (बृहदारण्यकोपनिषद्)

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