भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

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विचार कीजिये, अगर हमने विवेक प्रधान मनुष्य योनि में आवागमन के चक्र से मुक्त होकर के प्रभु के चरणारविन्दों की प्राप्ति नहीं की तो फिर किस योनि में कर पायेंगे ।

इसलिए सावधान ! नाना प्रकार के भोगों का संग्रह करना और भोग भोगना, यह मनुष्य जीवन का लक्ष्य नहीं है ।

कूकर शूकर करत हैं विष विषया को भोग ।

तुलसी वृथा न खोइये, यह तन भजिबे जोग ॥

अरे ! आहार, निद्रा, भय और मैथुन - ये तो हर योनियों के जीवों को प्राप्त होते हैं, अगर मनुष्य योनि में भी हम इन्हीं विषयों के सेवन में अमूल्य जीवन को नष्ट कर रहे हैं तो यह बड़ी हानि का विषय है । महाप्रभु श्रीहरिवंश चन्द्रजू महाराज कहते हैं -

मानुष कौ तन पाय, भजौ ब्रजनाथ कौ ।

दर्वी लैं कै मूढ़, जरावत हाथ कौ ॥ (स्फुटवाणी)

यह देह वासनाओं की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि उपासना के लिये प्रभु द्वारा कृपा करके दिया गया है ।

सुनहु उमा ते लोग अभागी ।

हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ॥ (मानस. ३/३३)

अगर अभी हम सावधान नहीं हुए - शरीर, मन, वाणी को प्रभु की उपासना में नहीं लगाया तो जन्म-जन्मान्तर तक बहुत पछताना पड़ेगा -

मन पछितैहै अवसर बीते ।

दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम बचन अरु ही ते ॥

ऐसा मत समझिये कि अगला जन्म हमको मनुष्य का ही मिलेगा और पुनः भजन करने का ऐसा अवसर प्राप्त होगा । अगला मनुष्य का जन्म उनको मिलता है जो सदा साधन परायण रहे हैं किन्तु किसी कारण से योगभ्रष्ट हो गए अर्थात् प्रभु से उनका योग नहीं हो

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