भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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पाया तो प्रभु कृपा करके उन्हें पुनः अवसर दे देते हैं, पर जो इस अवसर को प्रमाद में, शास्त्र और सन्तों की आज्ञा का उल्लंघन करके, अमर्यादित चेशाओं के द्वारा नष्ट करता है तो उस पर प्रभु कुपित हो जाते हैं कि हमने करुणा करके इसे मनुष्य शरीर दिया और इसने प्रमादयुक्त होकर, शास्त्र विरुद्ध आचरण करके, उस अमूल्य जीवन को नष्ट किया; अतः फिर उसको प्रभु नारकीय योनियों में अर्थात् तिर्यक् योनियों में भेज देते हैं, जहाँ उसे नाना प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं । गीताजी में प्रभु ने स्वयं कहा है -

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ (१६/१६)

'विषय-भोगों में अत्यन्त आसक्त लोग अपवित्र नरक में गिरते हैं।' काम, क्रोध, लोभ ये नरक के दरबाजे हैं -

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्तयं त्यजेत् ॥ (१६/२१)

इसी मनुष्य योनि में ही हम अपना हित कर सकते हैं । अन्य योनियाँ तो भोगयोनि हैं, उनमें यह स्वतंत्रता नहीं है कि हम नवीन कर्म करके प्रभु की प्राप्ति कर सकें । उनके प्रारब्धानुसार शुभकर्म बन जायें तो बन जायें अन्यथा विवेक के द्वारा वे नवीन कर्म करने की योग्यता नहीं रखते हैं ।

अन्य जो भी योनियाँ हैं, चाहे वे देवयोनि ही क्यों न हों, वे सब भोगयोनि के अन्तर्गत ही आते हैं क्योंकि वे भी स्वर्ग में अपने शुभकर्मों का भोग कर रहे हैं । जैसे नरक में अशुभ कर्म का भोग है, वैसे ही स्वर्ग में शुभकर्मों का भोग है । एक मृत्युलोक में ही और उसमें भी यह मनुष्य शरीर ही ऐसा है जिसमें प्रारब्धानुसार प्राप्त शुभ और अशुभ कर्मों को भोगते हुए नवीन कर्म करके अर्थात् भगवद् उपासना करके शुभ-अशुभ दोनों कर्मों से ऊपर उठा जा सकता है ।

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