भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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श्रीहिताचार्यचरण स्फुटवाणी में कहते हैं -

तैं भाजन कृत जटित विमल चंदन कृत इन्धन ।

अमृत पूरि तिहि मध्य करत सरषप खल रिंधन ॥

जैसे कोई विविध रत्नों से जटित स्वर्णपात्र में अमृत भरकर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर चन्दन की लकड़ी से अग्नि प्रज्वलित करके उसमें सरसों की खली को रँधे तो वह पुरुष मन्दमति नहीं तो क्या कहा जाएगा ? ऐसे ही यह मनुष्य शरीर स्वर्णपात्र की भाँति दुर्लभ है और यह रत्नजटित अर्थात् समस्त दैवीय सम्पदा (सदुणों) से संपन्न है तथा इसमें ज्ञान-विज्ञान रूपी अमृत भरा हुआ है, जो अभागी मनुष्य श्वाँसों को खर्चा करके अर्थात् जलाकर इसमें विषय-भोग रूपी खली को रँधता है तो वह महामूर्ख नहीं तो क्या है ? फिर दूसरे रूपक में श्रीहरिवंशचन्द्र जू कहते हैं -

अद्भुत धर पर करत कष्ट कंचन हल वाहत ।

बार करत पाँवार मंद बोवन विष चाहत ॥

अद्भुत भूमि में कष्ट करके कंचन के हल से उसे जोतकर उसमें मूँगे की बाड़ लगाकर, उसमें तुम विष बोना चाहते हो। इसीलिये सावधान! यह मनुष्य शरीर बड़ा दुर्लभ है और यह नरदेह ही ऐसी भूमि है जिसमें हम शुभ-अशुभ कर्म रूपी धान्य बोकर स्वर्ग-नरक कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं अथवा प्रभु की आराधना करके मोक्षपद या भगवत्प्रेम प्राप्त कर सकते हैं, समस्त पुरुषार्थों को देने वाला यह मनुष्य देह है ।

जैश्री हित हरिवंश विचारि कै मनुज देह गुरु-चरन गहि ।

सकहि तौ सब परपंच तजि कृष्ण-कृष्ण गोविन्द कहि ॥

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