भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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अतः इस शरीर का दुरुपयोग मत करो, गुरु-चरणों का आश्रय ग्रहण कर और यदि संभव हो तो सकल प्रपंच का त्याग करके प्रभु की उपासना में इस शरीर को लगाओ ।

जो हम दुर्लभ मनुष्य शरीर को विषय-भोगों में नष्ट कर रहे हैं, यह बहुत हानि की बात है ।

‘हीरा जनम अमोल है कौड़ी बदले जाय ।’

यद्यपि प्रमाद और अविद्या के कारण यह बात हमारे समझ में नहीं आ रही है; जबकि हमारी इस दशा को देखकर पशु भी हँसते हैं कि ‘देखो, यह कितना मूढ़ है ! इसे मनुष्य शरीर मिला है । यह भजन करके प्रभु को प्राप्त कर सकता है, पर हम जैसे पशुओं की भाँति यह भोगों को ही जीवन का सार समझ रहा है ।’ ऐसे कहकर पशु हम मनुष्यों पर हँसते हैं । श्रीमद्भागवत में ग्यारहवें स्कंध में लिखा है -

त्वङ्मांसरुधिरस्त्रायुमेदोमज्जास्थिसंहतौ ।

विष्णुमूत्रपूये रमतां कृमीणां कियदन्तरम् ॥ (११/२६/२१)

‘यह शरीर त्वचा, माँस, रक्त, स्त्रायु, मेद, मज्जा और अस्थि आदि से निर्मित है और इसमें मल-मूत्र, पीव आदि भरे हुए हैं, अतः ऐसे घृणित शरीर में जो रमण करता है, उसमें और मल-मूत्र के कीड़ों में क्या अन्तर रहा?’

प्रभु ने बहुत करुणा करके हमें मनुष्य शरीर दिया है, इसलिये हमें सतत् भजन परायण रहना है और विषय-सुख के लिए अपने अमूल्य जीवन को नष्ट नहीं करना है ।

श्रीरामचरितमानस में भगवान् राम ने प्रजाजनों को यही उपदेश दिया है -

बढ़ैं भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा ॥

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । पाइ न जेहिं परलोक सँवारा ॥

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