ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 13, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंसो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ । कालहि कर्मीहि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ ॥ एहि तन कर फल बिषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥ नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं । पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं ॥ नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥ करनधार सदगुर दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥ जो न तँरै भव सागर नर समाज अस पाइ । सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ ॥ (७/४३,४४)
श्रीमद्भागवत में भी यही बात लिखी है -
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः । तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥
'इस संसार में अनित्य होने पर भी अनेक जन्मों के बाद पुरुषार्थ को देने वाले इस दुर्लभ मनुष्य शरीर को पाकर जबतक मृत्यु नहीं आती है, धीर पुरुषों को चाहिए कि वे तबतक मोक्ष प्राप्ति के लिए शीघ्र ही प्रयत्न कर लें; विषय-भोगों में इस जीवन को नष्ट न करें क्योंकि विषय-भोग तो अन्य योनियों में भी प्राप्त हो सकते हैं ।'
तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः ।
तल्लभ्यते दुःखवदन्व्यतः सुखं कालेन सर्वत्र गभीररंहसा ॥
(१/५/१८)
'ऊँची-नीची नाना योनियों में भ्रमण करने पर भी भाग्यवश जिस वस्तु (प्रभु की) प्राप्ति नहीं होती है, विवेकीजनों को उसी वस्तु की प्राप्ति अर्थात् प्रभु की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए, विषयों की प्राप्ति के लिए नहीं; क्योंकि विषय सुख तो कालक्रम से दुखवत् (जैसे दुःख प्राप्ति के लिए कोई प्रयास नहीं करता) बिना प्रयास के सब योनियों में प्राप्त हो जाता है ।'
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