भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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प्र०-महाराजश्री, हम सब साधकों की तरफ से एक प्रश्न है कि कोई भी ब्रह्मचर्य नाश की क्रिया न करने पर भी कुछ दिनों में ब्रह्मचर्य स्वतः क्षीण (स्वप्रदोष) हो जाता है, फिर हम बहुत चिन्तित होते हैं तो ये क्यों होता है, इससे बचने का उपाय क्या है और स्वप्रदोष होने पर भी क्या हम ब्रह्मचारी हैं ?

समाधान - हमने बाल्यावस्था में जो परमहंस स्थिति को प्राप्त महापुरुष हैं, उनसे प्रश्न किया था कि महाराज जी कोई भी काम चेष्टा न करने पर भी उपासक के शरीर से जो वीर्यपात होता है तो क्या उसका ब्रह्मचर्य क्षीण माना जाएगा और यदि क्षीण माना जाएगा तो वह क्यों निकलता है, जब उसकी कोई क्रिया नहीं है और उसे कैसे रोका जा सकता है ? तो उस समय उन्होंने साधारण शब्दों में बताया था कि वीर्य दो तरह से निकलता है, एक तो जो घातक है, वह उसी के शरीर से निकलेगा, जिसने पहले कभी हस्तमैथुन किया है अर्थात् कुसंग के कारण गंदी क्रियाएँ करके बालकावस्था से ही वीर्य को नष्ट किया है । हस्तमैथुन या अन्य गंदी चेष्टा करने वाला कुछ वर्षों तक यह नहीं जान पाता है कि इस क्रिया के द्वारा मेरी हानि हो रही है, क्योंकि जीवनी-शक्ति भगवान् अपनी ओर से देते हैं कोई विलकुल न खाए और हस्तमैथुन करे तो भी कुछ समय तक उसको समझ में नहीं आयेगा, कुछ समय के बाद जब उसकी स्थायी जीवनी शक्ति से क्षीण होना प्रारंभ हो जाएगा, तब उसके जीवन में वीर्य-हानि से होने वाले लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं, अब यदि वह किसी अच्छे संग के प्रभाव से हस्तमैथुन करना बंद कर देता है, तब भी उसका कुछ समय तक वीर्यपात (स्वप्रदोष) होगा; क्योंकि उसका अभ्यास बन गया है । दूसरी तरह का वीर्यपात वह है कि जब आप ठीक दिनचर्या से चल रहे हैं, कोई गंदी क्रिया नहीं करते हैं और न ही पहले कभी की अर्थात् जिसने

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