भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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करना चाहता है तो ब्रह्मचर्य अत्यावश्यक है । अगर साधक ब्रह्मचर्य नहीं धारण करेगा तो उसके हृदय में विषय लोलुपता बढ़ती चली जायेगी और वह विषय लोलुपता प्रियालाल के प्रेमरस में बाधक होती है । जैसे-जैसे साधक विषयस्वाद में आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे प्रियालाल की प्राप्ति की भावना नष्ट होती चली जायेगी । गीता जी में प्रभु ने कहा है कि जो धन-सम्पत्ति या भोगासक्त है, उसके हृदय में परमात्म प्राप्ति का निश्चय हो ही नहीं सकता है -

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहतचेतसाम् ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ (२/४४)

अतः ये वेग सहने ही पढ़ेंगे, चाहे इस जन्म में सहो, चाहे हजार जन्मों में, इनको सहे बिना अनर्थ-निवृत्ति नहीं होगी और साधक आगे नहीं बढ़ पायेगा -

शक्रोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ (गी. ५/२३)

‘मृत्यु से पूर्व ही अर्थात् शरीर का नाश होने से पहले ही जो काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेगों को सहने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है और वही सुखी है ।’ जो साधक सहने में आनाकानी करेगा कि हमसे भजन नहीं होता है, हमसे ये वेग नहीं सहे जाते, हमसे प्रतिकूलता सही नहीं जाती, तो फिर उसे परमार्थ की प्राप्ति कैसे होगी ? वह तो फिर इस परमार्थ पर चलने लायक ही नहीं हैं । जो बलहीन पुरुष है, वह भगवत्प्राप्ति के योग्य नहीं रहता, ऐसा श्रुतियों में कहा है कि ‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः’ जिसके हृदय में ये भाव हो कि हम हर वेग को सहेंगे, हर कष्ट को सहेंगे, हर प्रतिकूल व्यवहार को सहेंगे तो वही सच्चा परमार्थ-पथ का पथिक है और उसे इसी जन्म में प्रभु की प्राप्ति हो जायेगी ।

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