ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभजन के प्रति महत्त्व बुद्धि होगी कि अगर हमने क्रोध किया तो हमारा भजन नष्ट हो जाएगा । भजन रूपी धन को बचाने के लिए क्रोध के वेग को सहना पड़ेगा । अगर जीवन में कोई प्रतिकूल परिस्थिति आ रही है तो वह भगवत्-कृपा के द्वारा प्रेरित होकर हमें पवित्र करने के लिए आ रही है । कोई निंदा या अपमान कर रहा है तो ऐसा भाव करें कि प्रभु की इच्छा से यह हमें पवित्र करके प्रभु का प्रेम प्रदान करेगा, फिर हमें क्रोध नहीं आयेगा ।
जिह्वा का वेग - अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट पदार्थ पाने के लिए हमारी रसनेन्द्रिय में वेग आता है, आज हमको ये पाना है तो जिस विषयरस की जिह्वा में चाह हो उसको वह पवाया ही न जाय । अगर संयोगवशात् वह पदार्थ प्राप्त भी हो जाए तो प्रभु को भोग लगाकर उसको बाँट दो, थोड़ा किनका रूप से पा लो तो इससे जिह्वा में जिस विषय का राग पैदा हुआ, वह नष्ट हो जायेगा । श्रीदत्तात्रेय जी महाराज ने कहा है -
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद्विजितान्येन्द्रियः पुमान् ।
न जयेद् रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे ॥ (भा. ११/८/२१)
‘समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने पर भी जो लोग रसना पर विजय नहीं प्राप्त कर सके, उन्हें जितेन्द्रिय नहीं कहा जा सकता है ।’
उदर का वेग - उदर के वेग को रोकने के लिए साधक में भूख सहने की सामर्थ्य होनी चाहिए क्योंकि जीवन में कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ भी आती हैं कि जब खाने को कुछ नहीं मिलता है, उपवास भी करना पड़ता है, ऐसा नहीं कि भूख लगी तो कहीं भी पाने लग गए, साधक में खान-पान सम्बन्धी यह विवेक होना चाहिए ।
उपस्थेन्द्रिय का वेग - जननेन्द्रिय पर विशेष शासन करने की आवश्यकता है । यदि साधक समस्त अनर्थों को सर्वथा के लिए नष्ट
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