भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 74 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

काम के वेग को सहन कर लेते हैं और सहने से ही उसका नाश हो जाता है ।

यही बात श्रीरूपगोस्वामी जी भी उपदेशामृत में कह रहे हैं -

वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं जिह्वावेगं उदरोपस्थ वेगम् ।

एतान् वेगान् यो विषहेत धीरः सर्वात्मपीमां पृथिवीं स शिष्यात् ॥

‘जो धीर पुरुष - वाणी के वेग को, मन के वेग को, क्रोध के वेग को, जिह्वा के वेग, उदर एवं जननेन्द्रिय के वेग को सहन कर लेता है तो ऐसा जितेन्द्रिय व जितात्मा पुरुष सारी पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह जगद्दुर कहलाने का अधिकारी बन जाता है ।’

इसका भाव यह है कि जब तक साधक इन वेगों को नहीं सहेगा, तब तक वह परमार्थ की उँचाई पर नहीं पहुँच सकता है । इन वेगों को सहन करने के उपाय -

वाणी का वेग - यदि वाणी में वाचालता आ रही है तो मौन के द्वारा वाणी के वेग को रोक लेना चाहिए और यदि यह सम्भव नहीं हो पा रहा हो तो तुरंत प्रियालाल के यश का गान करने लग जाऐं तो उस वेग का सद्‌उपयोग हो जाएगा ।

मन का वेग - मन जिस भी विषय, वस्तु, व्यक्ति या पदार्थ में जा रहा है, या तो उसको वहाँ से हटाकर प्रभु में लगाओ, नहीं तो जहाँ मन जा रहा, वहीं प्रभु की भावना करो अर्थात् ये व्यक्ति-वस्तु-पदार्थ आदि सब कुछ प्रभु ही हैं-‘चिदचिल्लक्षणं सर्वं राधाकृष्णमयं जगत् ।’

क्रोध का वेग - जब कोई प्रतिकूलता हमारे सामने उपस्थित होती है, तब क्रोध आता है और क्रोध करने से साधक की बहुत बड़ी हानि हो जाती है, क्रोध आने पर कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार नष्ट हो जाता है, क्रोध के वेग को तभी सहा जा सकता है, जब साधक की

Scanned with CamScanner