ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंमूर्ति बनी है, उसको तिल-तिल काटा गया लेकिन ये टूटा नहीं, सब सहता रहा तो ये मूर्ती बनकर के पुज रहा है और ये कमजोर संगमरमर पैरों के नीचे रौंदा जा रहा है । यानी सार बात उसने महाराज जी से यह कही कि भगवद्-मार्ग में चले हो तो कमजोर मत बनना, चाहे जैसी स्थिति आये सब सहना तो इस मूर्ति की तरह जगत्पूज्य बन जाओगे ।)
अतः जो साधक विविध प्रकार के वेगों को, प्रतिकूलताओं को सह जाता है, वही महात्मा एवं जगत्पूज्य हो जाता है । इसलिए साधक को चाहिए कि काम, क्रोध, लोभ आदि के वेग आर्ये तो घबड़ाये नहीं और उनके अनुसार चेष्टा भी नहीं करे, उनको सह जाए तो सहते-सहते एक दिन ये नष्ट हो जाते हैं । किन्तु जो इन वेगों को न सहकर और उनके अनुसार चेष्टा कर बैठता है कि इस भोग को भोग लें तो शान्ति मिल जायेगी तो भोगने से कभी शान्ति नहीं मिलती है अपितु तृष्णा और काम और अधिक बढ़ जाता है –
बुझे न काम अगिनि 'तुलसी' कहूँ विषय-भोग बहु घी ते ॥
श्रीप्रह्लादजी श्रीमद्भागवत में कह रहे हैं कि –
यन्मैथुनादिगृहमेधिसुखं हि तुच्छं कण्ठयनेन करयोरिव दुःखदुःखम् ।
तृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदुःखभाजः कण्ठूतिवन्मनसिजं विषहेत धीरः ॥
‘लोगों को मैथुन आदि का जो सुख मिलता है, वह अत्यन्त तुच्छ एवं दुःखरूप ही है, जिस प्रकार कोई दोनों हाथों से खुजली को खुजलाता है तो तत्काल उसे थोड़ा-सा सुख मिलता है, परंतु बाद में वह खुजली ठीक होने की बजाय और पक जाती है तथा उसमें बहुत कष्ट होता है । ऐसे ही विषयों का सुख परिणाम में दुःखरूप ही है फिर ही ये भूले हुए अज्ञानी मनुष्य बहुत दुःख भोगने पर भी इन विषयों से अघाते नहीं किन्तु इसके विपरीत । धीर पुरुष खुजलाहट के समान
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