भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तिक्ष्स्व भारत ॥ (गी. २/१४)

शीतोष्ण का तात्पर्य होता है - अनुकूलता एवं प्रतिकूलता । इसी में सारे द्वन्द्व आ गए । ‘आगमापायिनोऽनित्याः’ ये सब द्वन्द्व आने-जाने वाले नाशवान हैं ‘तांस्तिक्ष्स्व भारत’ तू इनको सह अर्थात् भगवान् की भक्ति करते हुए, हमें यह विकार सहने होंगे क्योंकि भगवान् ऐसा चाहते हैं कि हम इनको सहें । इनको सहने से हम प्रेम-रस सहने की योग्यता प्राप्त कर लेंगे, जिसने काम-क्रोधदि के वेग को नहीं सहा । वह परमपद का अधिकारी नहीं हो सकता है ।

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ (गी. २/१५)

सुख-दुःख, हर्ष-शोक या काम-क्रोध आदि के जो वेग हैं, इनको जो सह जाता है, इनसे व्यथित नहीं होता है, वह परम पद का अधिकारी हो जाता है । श्री सेवक जी महाराज कहते हैं - ‘सहत सहत बाढ़ै भगति ।’ सहने से भक्ति की वृद्धि होती है ।

॥ (पूज्य महाराज श्री अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि जब वह अपनी तरुणावस्था में विरक्त होकर गंगा किनारे भ्रमण कर रहे थे तो एक शराबी ने उनको अपने पास बुलाकर उनसे कहा कि हमारे साथ चलो और वह उन्हें एक मंदिर के बाहर ले जाकर श्रीविग्रह को दिखाकर कहने लगा कि देखो इसे, महाराज जी बोले - हाँ, देख रहे हैं, फिर वह लड़खड़ाते हुए उसने कहने लगा कि जानते हो यह मूर्ति क्यों पुज रही है, महाराज श्री बोले - प्रभु की मूर्ति है, इसलिए पुज रही है । वह बोला - नहीं, सिर्फ इतना ही कारण नहीं है, देखो, ये मूर्ती भी संगमरमर की है और फिर नीचे फर्श दिखाकर बोला कि इस फर्श में भी संगमरमर का ही पत्थर लगा हुआ है लेकिन जिस संगमरमर की

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