भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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अतः सच्चिदानंद प्रभु के नाम रूप लीला का क्या सुख है, वह विषयी जीव क्या जाने, अगर थोड़ा-सा भी भजन करेगा तो उसको पश्चाताप होगा, क्लेश होगा, अशांति होगी कि मैंने ऐसा क्यों किया । जो सत्संग करते हुए, आये हुए वेग और आकर्षण को यदि सह जाए और संयोग न बनने दे तो कुछ ही वर्षों में वह इन्द्रियजयी हो जाएगा । कुछ ही दिनों में उसके अन्दर ऐसा धैर्य आ जाएगा, जैसे बड़ी मेहनत से आपने एक लाख रुपये जमा किये, अब कोई उनको चुराना चाहे तो क्या आप दे दोगो ऐसे ही । इसी प्रकार से आप जल-जलकर १० वर्ष से ब्रह्मचर्य रहे और अब कोई आकर के आपको ब्रह्मचर्य से पतित करना चाहे तो आपके मन में आग लग जायेगी कि अरे, मैं कैसे ऐसा कर सकता हूँ । पता है कितना जलना पड़ता है, ये वही समझ सकता है, जो साधक इस मार्ग में चलता है ।

प्रकृति का आकर्षण सबके हृदय में होता है, इसी आकर्षण को मिटाने के लिए ही साधना की जाती है, भगवान् या भगवत्-स्वरूप आचार्यजनों को छोड़कर, शेष जितने संत हुए हैं, उसी आसक्ति को मिटाते हुए वहाँ पहुँचे हैं । कोई ऐसा नहीं कि जो जन्म से अनासक्त हो, जन्म से अनासक्त तो वही होता है जो भगवत्-स्वरूप को प्राप्त हो गया है, अब कारक पुरुष के रूप में अवतार लिया है कार्य करने के लिए, इसीलिये वह अनासक्त है । बकाया प्रत्येक साधक इसी आसक्ति से ही आगे बढ़ता है, कोई ऐसा नहीं है कि जिसके हृदय में काम वेदना न हो? पर इसी आसक्ति को मिटा देना ही हमारी साधना है । भगवान् सामने खड़े हैं पर अर्जुन से यह नहीं कह रहे हैं कि आज से तुम्हारे अन्दर काम-क्रोधादि विकार नहीं आयेंगे, ये वेग आयेंगे पर तुम्हें इनको सहना है, प्रभु अर्जुन को आदेश कर रहे हैं -

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