ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयत् पृथिव्यां त्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
न दुह्यन्ति मनःप्रीतिं पुंसः कामहतस्य ते ॥
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ (भा. ९/१९/१३,१४)
‘पृथ्वी पर जितना धान्य, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब कामनाओं से जर्जरित एक मनुष्य के मन को संतुष्ट नहीं कर सकती हैं क्योंकि भोग वासना विषयों के उपभोग से कभी शान्त नहीं होती है । जैसे प्रज्वलित अग्नि में घी डालने से अग्नि शान्त होने के बजाय और बढ़ जाती है, वैसे ही विषयसेवन से भोग वासना और बढ़ जाती है ।’
महाराज पुरुषा ने स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी का भोग किया किन्तु जब उनको वैराग्य हुआ, तब वह क्या कह रहे हैं । कहीं भी सुख नहीं, ये जो सुख बुद्धि है, यही हमें फँसाती है और इस बुद्धि को ठीक प्रभु ही करते हैं -
तेषां सतत युक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
द्वदामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ (गी. १०/१०)
जो प्रभु का सतत् भजन करता है, तो उसकी बुद्धि का प्रभु अपने से योग करा देते हैं, अभी हमारी बुद्धि प्रभु वियोगिनी है, संसार से योग किये हुए है इसलिए संसार में सुख लग रहा है जबकि है नहीं संसार में सुख । यदि किसी से इमानदारी से पूछ लिया जाए तो वह यही कहेगा । जो भजन करता है या विवेकी है उसकी बात कह रहे हैं, नहीं तो फिर नाली का कीड़ा तो नाली में ही सुख मानता है, उसको कहा जाए कि अमृत का भी एक कुण्ड है तो वह उसका भी तिरस्कार कर देगा, क्योंकि वह क्या जाने अमृत का स्वाद -
‘विष का कीड़ा विष ही खाय । मिश्री सँघत ही मर जाय ॥’
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