ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुष्टता की औषधी लें, व्यायाम, भोजन और संग में सुधार करें तथा चिंतन सुधारें । अगर विचार शुद्ध नहीं हुए तो बात नहीं बनेगी ।
प्र०-हम ब्रह्मचर्य का पालन क्यों नहीं कर पाते हैं ।
समाधान – जब तक सच्चिदानंद सुख का आस्वादन नहीं मिलता तब तक विषय-रस नहीं छूटता है, जबकि विषयों में कोई सुख नहीं है, अगर होता तो जिस स्त्री को आप सुन्दर देख रहे हो, उसी का पति किसी और स्त्री की तरफ देख रहा है, जिस पुरुष को वह सुन्दर देख रही है, उसकी पत्नी किसी और पुरुष को देख रही है । महाराज भर्तृहरि जी को इसी बात से तो वैराग्य हो गया कि मुझ चक्रवर्ती सम्राट की अर्धांगिनी एक अश्वपाल (घोड़े की सेवा करने वाले) में आसक्त हो गयी और वह अश्वपाल पिंगला रानी का संयोग प्राप्त करके भी उससे तृप्त न होकर वैश्या से संपर्क रखता है तो बोले अधिकार है इस झूठे संसार को और उन्होंने वैराग्य धारण कर लिया ।
चूँकि वहाँ सुख हो तब तो मिले, सुख कहीं है ही नहीं । केवल सुख का एक भ्रम है । जैसे मूर्ख कुत्ता सूखी हड्डी को लेकर भागता है और सोचता है कि इसमें बड़ा सुख है, और जब वह सूखी हड्डी को चबाता है तो उसके गलफड़ों से खून निकलता है, उसे चाटकर उसको एक सुख की अनुभूति होती है जबकि सुख है नहीं लेकिन मूर्खता वश वह ऐसा समझ रहा है, ऐसे ही हम अपनी एकाग्रता जहाँ आरोपित कर देते हैं, वहीं हमें सुख मिलने लगता है जबकि वहाँ सुख है नहीं, भ्रम से सुख का अनुभव हो रहा है । ऐसे ही हम भ्रम से अनुभव कर रहे हैं कि शरीर में सुख होगा, अगर पुरुष या स्त्री शरीर में सुख होता तो कोई तो ऐसा बोलता । इतिहास साक्षी है, भागवतजी में कई ऐसे प्रसंग हैं । महाराज ययाति ने अपने पुत्र की अवस्था लेकर विषयों का भोग किया किन्तु अंतिम में वे क्या कह रहे हैं –
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