भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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कि तुम निश्चित इन पर विजय प्राप्त कर लोगे क्योंकि भगवान् के तुम अंश हो ।

प्र०-बिना क्रिया के वीर्य स्वलित हो जाता है तो क्या करें ?

समाधान – अशुद्ध भोजन, कुसंग, गलत चिंतन, गलत आचरण आदि के कारण साधक अपने ब्रह्मचर्य को नहीं सँभाल पाता है । कई ऐसे कारण होते हैं, जिनसे साधक स्वप्रदोष से युक्त हो जाता है । जिस साधक ने पहले कभी किसी भी तरह से धातु को नष्ट किया है तो वीर्य का स्वभाव बन जाता है स्वलित होने का । अब जननेन्द्रिय का अभ्यास बन गया धातु क्षीण करने का, इसलिए अब वह चेष्टा न भी करे तो भी धातु अपने आप क्षीण हो जायेगी क्योंकि अभ्यास बन गया है । स्वतः वीर्य स्वलन का । एक कारण अनुचित आहार भी है; जब कोई ब्रह्मचर्य में निषिद्ध आहार का सेवन कर लेता है तो उससे भी धातु का क्षरण हो जाता है अथवा गलत चिंतन भी धातु क्षरण में एक हेतु है । जैसे स्वप्न में गलत चिंतन हुआ तो स्वप्रदोष हो जाता है ।

यदि साधक स्वप्रदोष से बचना चाहता है तो प्रभु की शरणागति से युक्त होकर के वह निरन्तर नामजप करे, सत्यास्त्रों का स्वाध्याय करे, सात्त्विक भोजन पाये और खूब शरीर से श्रम करे यानी शरीर को थकाए । शरीर को थकाना बहुत जरूरी है । यदि साधक नित्य प्रातःकाल उठकर के कम से कम १ घंटा व्यायाम करे तो उसको अनुभव होगा कि हमारा धातु क्षरण होना कम हुआ है, वीर्यपात में अन्तराय होता चला जाएगा ।

यदि कोई स्वयं दिन में कई बार हस्त-मैथुन के द्वारा वीर्य क्षरण करे और फिर इसके उपाय ढूँढ़े तो फिर क्या उपाय रह गया ? इसलिए पहले इस गंदी क्रिया को रोकें फिर आयुर्वेदिक किसी वैद्य से धातु

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