भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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है और वही इस महारस का अनुभव कर सकता है । बिल्कुल विचलित होने की जरूरत नहीं है, सबके हृदय में ऐसे भाव आते हैं (श्रीनारदजी ने भक्तिसूत्र में लिखा है कि जो तरंग की तरह गंदे भाव हृदय में उदय हो रहे हैं, साधक उनका चिंतन करके वैसी क्रिया न करे तो वह जो तरंग उठ रही है, वह नष्ट हो जायेगी और यदि आपने कहीं उसके अनुसार क्रिया कर ली तो वही तरंग समुद्र बन जायेगी फिर पार होना बड़ा कठिन है, समुद्र बन गयी तो डूबना ही पड़ेगा ।)

इसलिए साधक के मन में जहाँ कामादि दोषों की वृत्ति आये तो वह घबड़ाये नहीं, क्योंकि जब शत्रु सामने से आक्रमण कर रहा हो तो जो घबड़ा गया, वह योद्धा किस बात का ? अतः सबसे पहली बात साधक के हृदय में भय नहीं होना चाहिए । काम आया ठीक है, चला जाएगा । उसके प्रति महत्त्व बुद्धि नहीं देना है, कुछ समय पश्चात् वह भाव नष्ट हो जाएगा यानी चला जाएगा, वह हृदय में रुकने वाला भाव नहीं है क्योंकि सब आगन्तुक भाव हैं – ‘आगमापायिनोऽनित्याः’ कितना भी बड़ा वेग आए कुछ समय धैर्य पूर्वक अपने को बचाकर के रखो, वह निकल जाएगा । यदि आपने उसके अनुसार क्रिया नहीं होने दी तो धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ जायेगी कि उत्तरोत्तर क्षीण होते-होते, ये भाव आना ही बंद हो जायेंगे ।

साधक को सैकड़ों बार गिरने पर भी निरुत्साहित नहीं होना है । प्रायः अधिकांश साधक उत्साहहीन हो जाते हैं और आत्महत्या जैसा जघन्य पाप करने की सोचने लगते हैं जबकि यह बिल्कुल गलत है क्योंकि घबड़ाने की जरूरत नहीं है, विषयों से बार-बार परास्त होने के बाद भी फिर से इस संकल्प को लेकर उठो कि अबकी बार तो इन विषयों को परास्त करके ही रहूँगा और देखना एक दिन ऐसा आयेगा

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