ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय घबड़ाने की जरूरत नहीं है। एकदम तन्मय होने की जरूरत नहीं है कि हाय ! हमारा मन अब ऐसे दोषों से युक्त हो गया है। अब हमारा क्या होगा ? कुछ नहीं, कभी गरम हवा चलती है तो कभी ठण्डी। ऐसे ही कामादि दोष मन में संस्कारवश, संगवश या स्वभाववश आ जाते हैं। कहीं न कहीं कोई त्रुटि या प्रमाद होता है, तभी ऐसी वृत्ति आती है लेकिन आ गयी तो चली भी जाएगी, उसके प्रति बहुत महत्त्व बुद्धि न रखें। अगर उसके प्रति तन्मयता करोगे तो क्लेश का अनुभव होगा।
(इसलिए इतनी सावधानी जरूरी है कि न उसके अनुसार कोई क्रिया हो, न ही उसको महत्त्व देना है और भयभीत होने की भी इसलिए जरूरत नहीं क्योंकि मन में इतनी सामर्थ्य नहीं कि वह क्रिया के बिना हमें नष्ट कर दे।) क्रिया न होने पाए इसके लिए साधकों के बीच में रहे। अगर क्रिया न बनी तो मन धीरे-धीरे अमना होने लगता है। जिस भाव के लिए मन प्रेरित करे, उसको वह भाव न मिले तो धीरे-धीरे मन का मनपन नष्ट होने लगता है। भोगों का संकल्प करना ही मन का जीवित रहना है और भोगों से निःसंकल्पित हो जाना ही मन का मर जाना है।
जब साधक के मन में भोगों का संकल्प बने तो वह उसको पूरा न होने दे, थोड़ी जलन तो उसको सहनी पड़ेगी; इस वेग को सहना ही वास्तविक तपस्या है। जल पीकर रहना, वायु पीकर रहना, अग्नि में तपना, ये सब बाह्य साधन हैं, इनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है। वास्तविक तपस्या तो यह है कि जब हमारा मन प्रतिकूल भाव का चिंतन करके जलाता है, उसको साधक सहे। उस समय साधक को विचलित नहीं होना चाहिए बल्कि प्रभु के चिंतन में मग्न होकर धैर्य पूर्वक उस जलन को सह जाना चाहिए; जो सह जाता है, वही महात्मा
Scanned with CamScanner