ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य सम्बन्धी साधकों की कुछ जिज्ञासाएँ
प्रश्न - मेरा मन विषय-भोगों की ओर जाता है तो मैं क्या करूँ ?
समाधान - मन तो विषयों की ओर जाएगा ही क्योंकि जब तक पूर्ण रूप से अन्तःकरण पवित्र नहीं होता है, तब तक मन भोगों की तरफ जाता ही है, इसलिए इसमें विचलित होने की बात नहीं है । जब आपका मन विषयों के प्रति जाए तो उस समय आपको सावधानी यह रखनी है कि उसके कथनानुसार अर्थात् मन की प्रेरणा के अनुसार आपको कोई असत् चेष्टा नहीं करनी है क्योंकि मन चाहे जितनी उड़ान भरे किन्तु बिना तन (शरीर) के यह कर कुछ नहीं सकता । इसलिए मन जब कामादि दोषों से युक्त हो तो उस समय गंदी-क्रिया करने से बचना है तथा एकांत सेवन भी उस समय नहीं करना चाहिए । अच्छे लोगों के समूह में रहना चाहिए क्योंकि एकांत में मन हावी हो सकता है अर्थात् असत् चेष्टा करा सकता है । पूर्वकृत कर्मों का मन स्मरण कराता है और उस सुख की तृष्णा प्रकट करके विषयों को भोगने के लिए विवश करता है । साधक को चाहिए उस समय उदासीन होकर के उच्चस्वर से नाम-संकीर्तन करे, यदि यह भी संभव न हो तो इतना देखता रहे कि मन के अनुसार क्रिया न होने पाए । वह चिंतन थोड़ी देर के लिए आया है, यह बराबर स्थिति नहीं रहती है । जैसे भजन की कभी-कभी ऐसी रसमयी स्थिति आती है कि लगता है काम बन गया लेकिन वह बराबर नहीं रहती है । वह फिर हट जाती है । ऐसे ही जब मन गंदा भाव प्रकट करके विचलित करता है तो उस समय सबसे पहले साधक को धैर्य रखना चाहिए कि ये वृत्ति स्थायी नहीं है, थोड़ी देर के लिए आई है और कुछ समय पश्चात् स्वतः चली जायेगी ।
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