भारतकोश
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ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

ब्रह्मचर्य सम्बन्धी साधकों की कुछ जिज्ञासाएँ

प्रश्न - मेरा मन विषय-भोगों की ओर जाता है तो मैं क्या करूँ ?

समाधान - मन तो विषयों की ओर जाएगा ही क्योंकि जब तक पूर्ण रूप से अन्तःकरण पवित्र नहीं होता है, तब तक मन भोगों की तरफ जाता ही है, इसलिए इसमें विचलित होने की बात नहीं है । जब आपका मन विषयों के प्रति जाए तो उस समय आपको सावधानी यह रखनी है कि उसके कथनानुसार अर्थात् मन की प्रेरणा के अनुसार आपको कोई असत् चेष्टा नहीं करनी है क्योंकि मन चाहे जितनी उड़ान भरे किन्तु बिना तन (शरीर) के यह कर कुछ नहीं सकता । इसलिए मन जब कामादि दोषों से युक्त हो तो उस समय गंदी-क्रिया करने से बचना है तथा एकांत सेवन भी उस समय नहीं करना चाहिए । अच्छे लोगों के समूह में रहना चाहिए क्योंकि एकांत में मन हावी हो सकता है अर्थात् असत् चेष्टा करा सकता है । पूर्वकृत कर्मों का मन स्मरण कराता है और उस सुख की तृष्णा प्रकट करके विषयों को भोगने के लिए विवश करता है । साधक को चाहिए उस समय उदासीन होकर के उच्चस्वर से नाम-संकीर्तन करे, यदि यह भी संभव न हो तो इतना देखता रहे कि मन के अनुसार क्रिया न होने पाए । वह चिंतन थोड़ी देर के लिए आया है, यह बराबर स्थिति नहीं रहती है । जैसे भजन की कभी-कभी ऐसी रसमयी स्थिति आती है कि लगता है काम बन गया लेकिन वह बराबर नहीं रहती है । वह फिर हट जाती है । ऐसे ही जब मन गंदा भाव प्रकट करके विचलित करता है तो उस समय सबसे पहले साधक को धैर्य रखना चाहिए कि ये वृत्ति स्थायी नहीं है, थोड़ी देर के लिए आई है और कुछ समय पश्चात् स्वतः चली जायेगी ।

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उस समय घबड़ाने की जरूरत नहीं है। एकदम तन्मय होने की जरूरत नहीं है कि हाय ! हमारा मन अब ऐसे दोषों से युक्त हो गया है। अब हमारा क्या होगा ? कुछ नहीं, कभी गरम हवा चलती है तो कभी ठण्डी। ऐसे ही कामादि दोष मन में संस्कारवश, संगवश या स्वभाववश आ जाते हैं। कहीं न कहीं कोई त्रुटि या प्रमाद होता है, तभी ऐसी वृत्ति आती है लेकिन आ गयी तो चली भी जाएगी, उसके प्रति बहुत महत्त्व बुद्धि न रखें। अगर उसके प्रति तन्मयता करोगे तो क्लेश का अनुभव होगा।

(इसलिए इतनी सावधानी जरूरी है कि न उसके अनुसार कोई क्रिया हो, न ही उसको महत्त्व देना है और भयभीत होने की भी इसलिए जरूरत नहीं क्योंकि मन में इतनी सामर्थ्य नहीं कि वह क्रिया के बिना हमें नष्ट कर दे।) क्रिया न होने पाए इसके लिए साधकों के बीच में रहे। अगर क्रिया न बनी तो मन धीरे-धीरे अमना होने लगता है। जिस भाव के लिए मन प्रेरित करे, उसको वह भाव न मिले तो धीरे-धीरे मन का मनपन नष्ट होने लगता है। भोगों का संकल्प करना ही मन का जीवित रहना है और भोगों से निःसंकल्पित हो जाना ही मन का मर जाना है।

जब साधक के मन में भोगों का संकल्प बने तो वह उसको पूरा न होने दे, थोड़ी जलन तो उसको सहनी पड़ेगी; इस वेग को सहना ही वास्तविक तपस्या है। जल पीकर रहना, वायु पीकर रहना, अग्नि में तपना, ये सब बाह्य साधन हैं, इनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है। वास्तविक तपस्या तो यह है कि जब हमारा मन प्रतिकूल भाव का चिंतन करके जलाता है, उसको साधक सहे। उस समय साधक को विचलित नहीं होना चाहिए बल्कि प्रभु के चिंतन में मग्न होकर धैर्य पूर्वक उस जलन को सह जाना चाहिए; जो सह जाता है, वही महात्मा

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है और वही इस महारस का अनुभव कर सकता है । बिल्कुल विचलित होने की जरूरत नहीं है, सबके हृदय में ऐसे भाव आते हैं (श्रीनारदजी ने भक्तिसूत्र में लिखा है कि जो तरंग की तरह गंदे भाव हृदय में उदय हो रहे हैं, साधक उनका चिंतन करके वैसी क्रिया न करे तो वह जो तरंग उठ रही है, वह नष्ट हो जायेगी और यदि आपने कहीं उसके अनुसार क्रिया कर ली तो वही तरंग समुद्र बन जायेगी फिर पार होना बड़ा कठिन है, समुद्र बन गयी तो डूबना ही पड़ेगा ।)

इसलिए साधक के मन में जहाँ कामादि दोषों की वृत्ति आये तो वह घबड़ाये नहीं, क्योंकि जब शत्रु सामने से आक्रमण कर रहा हो तो जो घबड़ा गया, वह योद्धा किस बात का ? अतः सबसे पहली बात साधक के हृदय में भय नहीं होना चाहिए । काम आया ठीक है, चला जाएगा । उसके प्रति महत्त्व बुद्धि नहीं देना है, कुछ समय पश्चात् वह भाव नष्ट हो जाएगा यानी चला जाएगा, वह हृदय में रुकने वाला भाव नहीं है क्योंकि सब आगन्तुक भाव हैं – ‘आगमापायिनोऽनित्याः’ कितना भी बड़ा वेग आए कुछ समय धैर्य पूर्वक अपने को बचाकर के रखो, वह निकल जाएगा । यदि आपने उसके अनुसार क्रिया नहीं होने दी तो धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ जायेगी कि उत्तरोत्तर क्षीण होते-होते, ये भाव आना ही बंद हो जायेंगे ।

साधक को सैकड़ों बार गिरने पर भी निरुत्साहित नहीं होना है । प्रायः अधिकांश साधक उत्साहहीन हो जाते हैं और आत्महत्या जैसा जघन्य पाप करने की सोचने लगते हैं जबकि यह बिल्कुल गलत है क्योंकि घबड़ाने की जरूरत नहीं है, विषयों से बार-बार परास्त होने के बाद भी फिर से इस संकल्प को लेकर उठो कि अबकी बार तो इन विषयों को परास्त करके ही रहूँगा और देखना एक दिन ऐसा आयेगा

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कि तुम निश्चित इन पर विजय प्राप्त कर लोगे क्योंकि भगवान् के तुम अंश हो ।

प्र०-बिना क्रिया के वीर्य स्वलित हो जाता है तो क्या करें ?

समाधान – अशुद्ध भोजन, कुसंग, गलत चिंतन, गलत आचरण आदि के कारण साधक अपने ब्रह्मचर्य को नहीं सँभाल पाता है । कई ऐसे कारण होते हैं, जिनसे साधक स्वप्रदोष से युक्त हो जाता है । जिस साधक ने पहले कभी किसी भी तरह से धातु को नष्ट किया है तो वीर्य का स्वभाव बन जाता है स्वलित होने का । अब जननेन्द्रिय का अभ्यास बन गया धातु क्षीण करने का, इसलिए अब वह चेष्टा न भी करे तो भी धातु अपने आप क्षीण हो जायेगी क्योंकि अभ्यास बन गया है । स्वतः वीर्य स्वलन का । एक कारण अनुचित आहार भी है; जब कोई ब्रह्मचर्य में निषिद्ध आहार का सेवन कर लेता है तो उससे भी धातु का क्षरण हो जाता है अथवा गलत चिंतन भी धातु क्षरण में एक हेतु है । जैसे स्वप्न में गलत चिंतन हुआ तो स्वप्रदोष हो जाता है ।

यदि साधक स्वप्रदोष से बचना चाहता है तो प्रभु की शरणागति से युक्त होकर के वह निरन्तर नामजप करे, सत्यास्त्रों का स्वाध्याय करे, सात्त्विक भोजन पाये और खूब शरीर से श्रम करे यानी शरीर को थकाए । शरीर को थकाना बहुत जरूरी है । यदि साधक नित्य प्रातःकाल उठकर के कम से कम १ घंटा व्यायाम करे तो उसको अनुभव होगा कि हमारा धातु क्षरण होना कम हुआ है, वीर्यपात में अन्तराय होता चला जाएगा ।

यदि कोई स्वयं दिन में कई बार हस्त-मैथुन के द्वारा वीर्य क्षरण करे और फिर इसके उपाय ढूँढ़े तो फिर क्या उपाय रह गया ? इसलिए पहले इस गंदी क्रिया को रोकें फिर आयुर्वेदिक किसी वैद्य से धातु

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पुष्टता की औषधी लें, व्यायाम, भोजन और संग में सुधार करें तथा चिंतन सुधारें । अगर विचार शुद्ध नहीं हुए तो बात नहीं बनेगी ।

प्र०-हम ब्रह्मचर्य का पालन क्यों नहीं कर पाते हैं ।

समाधान – जब तक सच्चिदानंद सुख का आस्वादन नहीं मिलता तब तक विषय-रस नहीं छूटता है, जबकि विषयों में कोई सुख नहीं है, अगर होता तो जिस स्त्री को आप सुन्दर देख रहे हो, उसी का पति किसी और स्त्री की तरफ देख रहा है, जिस पुरुष को वह सुन्दर देख रही है, उसकी पत्नी किसी और पुरुष को देख रही है । महाराज भर्तृहरि जी को इसी बात से तो वैराग्य हो गया कि मुझ चक्रवर्ती सम्राट की अर्धांगिनी एक अश्वपाल (घोड़े की सेवा करने वाले) में आसक्त हो गयी और वह अश्वपाल पिंगला रानी का संयोग प्राप्त करके भी उससे तृप्त न होकर वैश्या से संपर्क रखता है तो बोले अधिकार है इस झूठे संसार को और उन्होंने वैराग्य धारण कर लिया ।

चूँकि वहाँ सुख हो तब तो मिले, सुख कहीं है ही नहीं । केवल सुख का एक भ्रम है । जैसे मूर्ख कुत्ता सूखी हड्डी को लेकर भागता है और सोचता है कि इसमें बड़ा सुख है, और जब वह सूखी हड्डी को चबाता है तो उसके गलफड़ों से खून निकलता है, उसे चाटकर उसको एक सुख की अनुभूति होती है जबकि सुख है नहीं लेकिन मूर्खता वश वह ऐसा समझ रहा है, ऐसे ही हम अपनी एकाग्रता जहाँ आरोपित कर देते हैं, वहीं हमें सुख मिलने लगता है जबकि वहाँ सुख है नहीं, भ्रम से सुख का अनुभव हो रहा है । ऐसे ही हम भ्रम से अनुभव कर रहे हैं कि शरीर में सुख होगा, अगर पुरुष या स्त्री शरीर में सुख होता तो कोई तो ऐसा बोलता । इतिहास साक्षी है, भागवतजी में कई ऐसे प्रसंग हैं । महाराज ययाति ने अपने पुत्र की अवस्था लेकर विषयों का भोग किया किन्तु अंतिम में वे क्या कह रहे हैं –

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यत् पृथिव्यां त्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।

न दुह्यन्ति मनःप्रीतिं पुंसः कामहतस्य ते ॥

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ (भा. ९/१९/१३,१४)

‘पृथ्वी पर जितना धान्य, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब कामनाओं से जर्जरित एक मनुष्य के मन को संतुष्ट नहीं कर सकती हैं क्योंकि भोग वासना विषयों के उपभोग से कभी शान्त नहीं होती है । जैसे प्रज्वलित अग्नि में घी डालने से अग्नि शान्त होने के बजाय और बढ़ जाती है, वैसे ही विषयसेवन से भोग वासना और बढ़ जाती है ।’

महाराज पुरुषा ने स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी का भोग किया किन्तु जब उनको वैराग्य हुआ, तब वह क्या कह रहे हैं । कहीं भी सुख नहीं, ये जो सुख बुद्धि है, यही हमें फँसाती है और इस बुद्धि को ठीक प्रभु ही करते हैं -

तेषां सतत युक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।

द्वदामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ (गी. १०/१०)

जो प्रभु का सतत् भजन करता है, तो उसकी बुद्धि का प्रभु अपने से योग करा देते हैं, अभी हमारी बुद्धि प्रभु वियोगिनी है, संसार से योग किये हुए है इसलिए संसार में सुख लग रहा है जबकि है नहीं संसार में सुख । यदि किसी से इमानदारी से पूछ लिया जाए तो वह यही कहेगा । जो भजन करता है या विवेकी है उसकी बात कह रहे हैं, नहीं तो फिर नाली का कीड़ा तो नाली में ही सुख मानता है, उसको कहा जाए कि अमृत का भी एक कुण्ड है तो वह उसका भी तिरस्कार कर देगा, क्योंकि वह क्या जाने अमृत का स्वाद -

‘विष का कीड़ा विष ही खाय । मिश्री सँघत ही मर जाय ॥’

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अतः सच्चिदानंद प्रभु के नाम रूप लीला का क्या सुख है, वह विषयी जीव क्या जाने, अगर थोड़ा-सा भी भजन करेगा तो उसको पश्चाताप होगा, क्लेश होगा, अशांति होगी कि मैंने ऐसा क्यों किया । जो सत्संग करते हुए, आये हुए वेग और आकर्षण को यदि सह जाए और संयोग न बनने दे तो कुछ ही वर्षों में वह इन्द्रियजयी हो जाएगा । कुछ ही दिनों में उसके अन्दर ऐसा धैर्य आ जाएगा, जैसे बड़ी मेहनत से आपने एक लाख रुपये जमा किये, अब कोई उनको चुराना चाहे तो क्या आप दे दोगो ऐसे ही । इसी प्रकार से आप जल-जलकर १० वर्ष से ब्रह्मचर्य रहे और अब कोई आकर के आपको ब्रह्मचर्य से पतित करना चाहे तो आपके मन में आग लग जायेगी कि अरे, मैं कैसे ऐसा कर सकता हूँ । पता है कितना जलना पड़ता है, ये वही समझ सकता है, जो साधक इस मार्ग में चलता है ।

प्रकृति का आकर्षण सबके हृदय में होता है, इसी आकर्षण को मिटाने के लिए ही साधना की जाती है, भगवान् या भगवत्-स्वरूप आचार्यजनों को छोड़कर, शेष जितने संत हुए हैं, उसी आसक्ति को मिटाते हुए वहाँ पहुँचे हैं । कोई ऐसा नहीं कि जो जन्म से अनासक्त हो, जन्म से अनासक्त तो वही होता है जो भगवत्-स्वरूप को प्राप्त हो गया है, अब कारक पुरुष के रूप में अवतार लिया है कार्य करने के लिए, इसीलिये वह अनासक्त है । बकाया प्रत्येक साधक इसी आसक्ति से ही आगे बढ़ता है, कोई ऐसा नहीं है कि जिसके हृदय में काम वेदना न हो? पर इसी आसक्ति को मिटा देना ही हमारी साधना है । भगवान् सामने खड़े हैं पर अर्जुन से यह नहीं कह रहे हैं कि आज से तुम्हारे अन्दर काम-क्रोधादि विकार नहीं आयेंगे, ये वेग आयेंगे पर तुम्हें इनको सहना है, प्रभु अर्जुन को आदेश कर रहे हैं -

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मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तिक्ष्स्व भारत ॥ (गी. २/१४)

शीतोष्ण का तात्पर्य होता है - अनुकूलता एवं प्रतिकूलता । इसी में सारे द्वन्द्व आ गए । ‘आगमापायिनोऽनित्याः’ ये सब द्वन्द्व आने-जाने वाले नाशवान हैं ‘तांस्तिक्ष्स्व भारत’ तू इनको सह अर्थात् भगवान् की भक्ति करते हुए, हमें यह विकार सहने होंगे क्योंकि भगवान् ऐसा चाहते हैं कि हम इनको सहें । इनको सहने से हम प्रेम-रस सहने की योग्यता प्राप्त कर लेंगे, जिसने काम-क्रोधदि के वेग को नहीं सहा । वह परमपद का अधिकारी नहीं हो सकता है ।

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ (गी. २/१५)

सुख-दुःख, हर्ष-शोक या काम-क्रोध आदि के जो वेग हैं, इनको जो सह जाता है, इनसे व्यथित नहीं होता है, वह परम पद का अधिकारी हो जाता है । श्री सेवक जी महाराज कहते हैं - ‘सहत सहत बाढ़ै भगति ।’ सहने से भक्ति की वृद्धि होती है ।

॥ (पूज्य महाराज श्री अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि जब वह अपनी तरुणावस्था में विरक्त होकर गंगा किनारे भ्रमण कर रहे थे तो एक शराबी ने उनको अपने पास बुलाकर उनसे कहा कि हमारे साथ चलो और वह उन्हें एक मंदिर के बाहर ले जाकर श्रीविग्रह को दिखाकर कहने लगा कि देखो इसे, महाराज जी बोले - हाँ, देख रहे हैं, फिर वह लड़खड़ाते हुए उसने कहने लगा कि जानते हो यह मूर्ति क्यों पुज रही है, महाराज श्री बोले - प्रभु की मूर्ति है, इसलिए पुज रही है । वह बोला - नहीं, सिर्फ इतना ही कारण नहीं है, देखो, ये मूर्ती भी संगमरमर की है और फिर नीचे फर्श दिखाकर बोला कि इस फर्श में भी संगमरमर का ही पत्थर लगा हुआ है लेकिन जिस संगमरमर की

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मूर्ति बनी है, उसको तिल-तिल काटा गया लेकिन ये टूटा नहीं, सब सहता रहा तो ये मूर्ती बनकर के पुज रहा है और ये कमजोर संगमरमर पैरों के नीचे रौंदा जा रहा है । यानी सार बात उसने महाराज जी से यह कही कि भगवद्-मार्ग में चले हो तो कमजोर मत बनना, चाहे जैसी स्थिति आये सब सहना तो इस मूर्ति की तरह जगत्पूज्य बन जाओगे ।)

अतः जो साधक विविध प्रकार के वेगों को, प्रतिकूलताओं को सह जाता है, वही महात्मा एवं जगत्पूज्य हो जाता है । इसलिए साधक को चाहिए कि काम, क्रोध, लोभ आदि के वेग आर्ये तो घबड़ाये नहीं और उनके अनुसार चेष्टा भी नहीं करे, उनको सह जाए तो सहते-सहते एक दिन ये नष्ट हो जाते हैं । किन्तु जो इन वेगों को न सहकर और उनके अनुसार चेष्टा कर बैठता है कि इस भोग को भोग लें तो शान्ति मिल जायेगी तो भोगने से कभी शान्ति नहीं मिलती है अपितु तृष्णा और काम और अधिक बढ़ जाता है –

बुझे न काम अगिनि 'तुलसी' कहूँ विषय-भोग बहु घी ते ॥

श्रीप्रह्लादजी श्रीमद्भागवत में कह रहे हैं कि –

यन्मैथुनादिगृहमेधिसुखं हि तुच्छं कण्ठयनेन करयोरिव दुःखदुःखम् ।

तृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदुःखभाजः कण्ठूतिवन्मनसिजं विषहेत धीरः ॥

‘लोगों को मैथुन आदि का जो सुख मिलता है, वह अत्यन्त तुच्छ एवं दुःखरूप ही है, जिस प्रकार कोई दोनों हाथों से खुजली को खुजलाता है तो तत्काल उसे थोड़ा-सा सुख मिलता है, परंतु बाद में वह खुजली ठीक होने की बजाय और पक जाती है तथा उसमें बहुत कष्ट होता है । ऐसे ही विषयों का सुख परिणाम में दुःखरूप ही है फिर ही ये भूले हुए अज्ञानी मनुष्य बहुत दुःख भोगने पर भी इन विषयों से अघाते नहीं किन्तु इसके विपरीत । धीर पुरुष खुजलाहट के समान

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काम के वेग को सहन कर लेते हैं और सहने से ही उसका नाश हो जाता है ।

यही बात श्रीरूपगोस्वामी जी भी उपदेशामृत में कह रहे हैं -

वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं जिह्वावेगं उदरोपस्थ वेगम् ।

एतान् वेगान् यो विषहेत धीरः सर्वात्मपीमां पृथिवीं स शिष्यात् ॥

‘जो धीर पुरुष - वाणी के वेग को, मन के वेग को, क्रोध के वेग को, जिह्वा के वेग, उदर एवं जननेन्द्रिय के वेग को सहन कर लेता है तो ऐसा जितेन्द्रिय व जितात्मा पुरुष सारी पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह जगद्दुर कहलाने का अधिकारी बन जाता है ।’

इसका भाव यह है कि जब तक साधक इन वेगों को नहीं सहेगा, तब तक वह परमार्थ की उँचाई पर नहीं पहुँच सकता है । इन वेगों को सहन करने के उपाय -

वाणी का वेग - यदि वाणी में वाचालता आ रही है तो मौन के द्वारा वाणी के वेग को रोक लेना चाहिए और यदि यह सम्भव नहीं हो पा रहा हो तो तुरंत प्रियालाल के यश का गान करने लग जाऐं तो उस वेग का सद्‌उपयोग हो जाएगा ।

मन का वेग - मन जिस भी विषय, वस्तु, व्यक्ति या पदार्थ में जा रहा है, या तो उसको वहाँ से हटाकर प्रभु में लगाओ, नहीं तो जहाँ मन जा रहा, वहीं प्रभु की भावना करो अर्थात् ये व्यक्ति-वस्तु-पदार्थ आदि सब कुछ प्रभु ही हैं-‘चिदचिल्लक्षणं सर्वं राधाकृष्णमयं जगत् ।’

क्रोध का वेग - जब कोई प्रतिकूलता हमारे सामने उपस्थित होती है, तब क्रोध आता है और क्रोध करने से साधक की बहुत बड़ी हानि हो जाती है, क्रोध आने पर कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार नष्ट हो जाता है, क्रोध के वेग को तभी सहा जा सकता है, जब साधक की

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भजन के प्रति महत्त्व बुद्धि होगी कि अगर हमने क्रोध किया तो हमारा भजन नष्ट हो जाएगा । भजन रूपी धन को बचाने के लिए क्रोध के वेग को सहना पड़ेगा । अगर जीवन में कोई प्रतिकूल परिस्थिति आ रही है तो वह भगवत्-कृपा के द्वारा प्रेरित होकर हमें पवित्र करने के लिए आ रही है । कोई निंदा या अपमान कर रहा है तो ऐसा भाव करें कि प्रभु की इच्छा से यह हमें पवित्र करके प्रभु का प्रेम प्रदान करेगा, फिर हमें क्रोध नहीं आयेगा ।

जिह्वा का वेग - अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट पदार्थ पाने के लिए हमारी रसनेन्द्रिय में वेग आता है, आज हमको ये पाना है तो जिस विषयरस की जिह्वा में चाह हो उसको वह पवाया ही न जाय । अगर संयोगवशात् वह पदार्थ प्राप्त भी हो जाए तो प्रभु को भोग लगाकर उसको बाँट दो, थोड़ा किनका रूप से पा लो तो इससे जिह्वा में जिस विषय का राग पैदा हुआ, वह नष्ट हो जायेगा । श्रीदत्तात्रेय जी महाराज ने कहा है -

तावज्जितेन्द्रियो न स्याद्विजितान्येन्द्रियः पुमान् ।

न जयेद् रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे ॥ (भा. ११/८/२१)

‘समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने पर भी जो लोग रसना पर विजय नहीं प्राप्त कर सके, उन्हें जितेन्द्रिय नहीं कहा जा सकता है ।’

उदर का वेग - उदर के वेग को रोकने के लिए साधक में भूख सहने की सामर्थ्य होनी चाहिए क्योंकि जीवन में कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ भी आती हैं कि जब खाने को कुछ नहीं मिलता है, उपवास भी करना पड़ता है, ऐसा नहीं कि भूख लगी तो कहीं भी पाने लग गए, साधक में खान-पान सम्बन्धी यह विवेक होना चाहिए ।

उपस्थेन्द्रिय का वेग - जननेन्द्रिय पर विशेष शासन करने की आवश्यकता है । यदि साधक समस्त अनर्थों को सर्वथा के लिए नष्ट

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करना चाहता है तो ब्रह्मचर्य अत्यावश्यक है । अगर साधक ब्रह्मचर्य नहीं धारण करेगा तो उसके हृदय में विषय लोलुपता बढ़ती चली जायेगी और वह विषय लोलुपता प्रियालाल के प्रेमरस में बाधक होती है । जैसे-जैसे साधक विषयस्वाद में आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे प्रियालाल की प्राप्ति की भावना नष्ट होती चली जायेगी । गीता जी में प्रभु ने कहा है कि जो धन-सम्पत्ति या भोगासक्त है, उसके हृदय में परमात्म प्राप्ति का निश्चय हो ही नहीं सकता है -

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहतचेतसाम् ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ (२/४४)

अतः ये वेग सहने ही पढ़ेंगे, चाहे इस जन्म में सहो, चाहे हजार जन्मों में, इनको सहे बिना अनर्थ-निवृत्ति नहीं होगी और साधक आगे नहीं बढ़ पायेगा -

शक्रोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ (गी. ५/२३)

‘मृत्यु से पूर्व ही अर्थात् शरीर का नाश होने से पहले ही जो काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेगों को सहने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है और वही सुखी है ।’ जो साधक सहने में आनाकानी करेगा कि हमसे भजन नहीं होता है, हमसे ये वेग नहीं सहे जाते, हमसे प्रतिकूलता सही नहीं जाती, तो फिर उसे परमार्थ की प्राप्ति कैसे होगी ? वह तो फिर इस परमार्थ पर चलने लायक ही नहीं हैं । जो बलहीन पुरुष है, वह भगवत्प्राप्ति के योग्य नहीं रहता, ऐसा श्रुतियों में कहा है कि ‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः’ जिसके हृदय में ये भाव हो कि हम हर वेग को सहेंगे, हर कष्ट को सहेंगे, हर प्रतिकूल व्यवहार को सहेंगे तो वही सच्चा परमार्थ-पथ का पथिक है और उसे इसी जन्म में प्रभु की प्राप्ति हो जायेगी ।

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प्र०-महाराजश्री, हम सब साधकों की तरफ से एक प्रश्न है कि कोई भी ब्रह्मचर्य नाश की क्रिया न करने पर भी कुछ दिनों में ब्रह्मचर्य स्वतः क्षीण (स्वप्रदोष) हो जाता है, फिर हम बहुत चिन्तित होते हैं तो ये क्यों होता है, इससे बचने का उपाय क्या है और स्वप्रदोष होने पर भी क्या हम ब्रह्मचारी हैं ?

समाधान - हमने बाल्यावस्था में जो परमहंस स्थिति को प्राप्त महापुरुष हैं, उनसे प्रश्न किया था कि महाराज जी कोई भी काम चेष्टा न करने पर भी उपासक के शरीर से जो वीर्यपात होता है तो क्या उसका ब्रह्मचर्य क्षीण माना जाएगा और यदि क्षीण माना जाएगा तो वह क्यों निकलता है, जब उसकी कोई क्रिया नहीं है और उसे कैसे रोका जा सकता है ? तो उस समय उन्होंने साधारण शब्दों में बताया था कि वीर्य दो तरह से निकलता है, एक तो जो घातक है, वह उसी के शरीर से निकलेगा, जिसने पहले कभी हस्तमैथुन किया है अर्थात् कुसंग के कारण गंदी क्रियाएँ करके बालकावस्था से ही वीर्य को नष्ट किया है । हस्तमैथुन या अन्य गंदी चेष्टा करने वाला कुछ वर्षों तक यह नहीं जान पाता है कि इस क्रिया के द्वारा मेरी हानि हो रही है, क्योंकि जीवनी-शक्ति भगवान् अपनी ओर से देते हैं कोई विलकुल न खाए और हस्तमैथुन करे तो भी कुछ समय तक उसको समझ में नहीं आयेगा, कुछ समय के बाद जब उसकी स्थायी जीवनी शक्ति से क्षीण होना प्रारंभ हो जाएगा, तब उसके जीवन में वीर्य-हानि से होने वाले लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं, अब यदि वह किसी अच्छे संग के प्रभाव से हस्तमैथुन करना बंद कर देता है, तब भी उसका कुछ समय तक वीर्यपात (स्वप्रदोष) होगा; क्योंकि उसका अभ्यास बन गया है । दूसरी तरह का वीर्यपात वह है कि जब आप ठीक दिनचर्या से चल रहे हैं, कोई गंदी क्रिया नहीं करते हैं और न ही पहले कभी की अर्थात् जिसने

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कभी हस्तमैथुन आदि के द्वारा वीर्यपात किया ही नहीं तो उसका असली वीर्य कभी भी पात होगा ही नहीं ।

यदि आपने कभी हस्तमैथुन नहीं किया, किसी भी तरह से जननेन्द्रिय का घर्षण करके वीर्यपात नहीं किया तो संतानोत्पत्ति की क्षमता वाला आपका जो वास्तविक वीर्य है, वह स्वाभाविक निकल ही नहीं सकता । यदि आपने गंदी क्रियाएँ करके पहले उसे मार्ग दे दिया है तो फिर उसके निकलने का मार्ग हो गया है । तो परमहंस जी ने बताया कि एक होता है आप सो रहे हैं और आपको बिल्कुल पता नहीं, बिल्कुल कोई काम का संकल्प नहीं, कोई क्रीड़ा नहीं और आप जगे आपको ऐसा लगा कि वीर्यपात हो गया तो वो दोष नहीं है । जैसे जब गुड़ बनाया जाता है तो उसमें गंदा फेन निकलता है ऊपर, ऐसे ही ये शरीर का विकार निकला न कि ब्रह्मचर्य नष्ट करने वाला वीर्य । इसलिए उपासक को उसमें परेशान नहीं होना है क्योंकि आपके ब्रह्मचर्य का नाश नहीं हुआ; और यदि आप हस्तमैथुन या अन्य क्रियाओं के द्वारा वीर्यपात करते रहे हैं और आज आपने रोक दिया कि क्या आज से नहीं करूँगा तो वह तत्काल बंद नहीं हो जाएगा, वह वीर्य स्वल्पन कुछ समय तक चलेगा, अगर आप ठीक नियम से चलेंगे तो कम से कम छः महीने लगेंगे उसको कवर करने में और अगर आपने प्रमाद स्थिति की कि वहतो निकल ही जाता है, फिर हमको वीर्यपात करने से क्यों मना किया जाता है तो आप देख लेना कि कुछ समय बाद आपकी हालत बहुत गंभीर हो जाएगी, जो आप बता भी नहीं पायेंगे किसी से; क्या गंभीर हो जाएगी ? आप ऐसे ही साधारण सी क्रियाओं में ही ब्रह्मचर्य हीन हो जायेंगे । जननेन्द्रिय को छूते ही वीर्यपात होने लगेगा । ये सब बातें हम महापुरुषों के अनुभव और इस तरह की गंभीर हालत वाले लोगों से मिलकर ही बता रहे हैं ।

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