ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
काम के वेग को सहन कर लेते हैं और सहने से ही उसका नाश हो जाता है ।
यही बात श्रीरूपगोस्वामी जी भी उपदेशामृत में कह रहे हैं -
वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं जिह्वावेगं उदरोपस्थ वेगम् ।
एतान् वेगान् यो विषहेत धीरः सर्वात्मपीमां पृथिवीं स शिष्यात् ॥
‘जो धीर पुरुष - वाणी के वेग को, मन के वेग को, क्रोध के वेग को, जिह्वा के वेग, उदर एवं जननेन्द्रिय के वेग को सहन कर लेता है तो ऐसा जितेन्द्रिय व जितात्मा पुरुष सारी पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह जगद्दुर कहलाने का अधिकारी बन जाता है ।’
इसका भाव यह है कि जब तक साधक इन वेगों को नहीं सहेगा, तब तक वह परमार्थ की उँचाई पर नहीं पहुँच सकता है । इन वेगों को सहन करने के उपाय -
वाणी का वेग - यदि वाणी में वाचालता आ रही है तो मौन के द्वारा वाणी के वेग को रोक लेना चाहिए और यदि यह सम्भव नहीं हो पा रहा हो तो तुरंत प्रियालाल के यश का गान करने लग जाऐं तो उस वेग का सद्उपयोग हो जाएगा ।
मन का वेग - मन जिस भी विषय, वस्तु, व्यक्ति या पदार्थ में जा रहा है, या तो उसको वहाँ से हटाकर प्रभु में लगाओ, नहीं तो जहाँ मन जा रहा, वहीं प्रभु की भावना करो अर्थात् ये व्यक्ति-वस्तु-पदार्थ आदि सब कुछ प्रभु ही हैं-‘चिदचिल्लक्षणं सर्वं राधाकृष्णमयं जगत् ।’
क्रोध का वेग - जब कोई प्रतिकूलता हमारे सामने उपस्थित होती है, तब क्रोध आता है और क्रोध करने से साधक की बहुत बड़ी हानि हो जाती है, क्रोध आने पर कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार नष्ट हो जाता है, क्रोध के वेग को तभी सहा जा सकता है, जब साधक की
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भजन के प्रति महत्त्व बुद्धि होगी कि अगर हमने क्रोध किया तो हमारा भजन नष्ट हो जाएगा । भजन रूपी धन को बचाने के लिए क्रोध के वेग को सहना पड़ेगा । अगर जीवन में कोई प्रतिकूल परिस्थिति आ रही है तो वह भगवत्-कृपा के द्वारा प्रेरित होकर हमें पवित्र करने के लिए आ रही है । कोई निंदा या अपमान कर रहा है तो ऐसा भाव करें कि प्रभु की इच्छा से यह हमें पवित्र करके प्रभु का प्रेम प्रदान करेगा, फिर हमें क्रोध नहीं आयेगा ।
जिह्वा का वेग - अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट पदार्थ पाने के लिए हमारी रसनेन्द्रिय में वेग आता है, आज हमको ये पाना है तो जिस विषयरस की जिह्वा में चाह हो उसको वह पवाया ही न जाय । अगर संयोगवशात् वह पदार्थ प्राप्त भी हो जाए तो प्रभु को भोग लगाकर उसको बाँट दो, थोड़ा किनका रूप से पा लो तो इससे जिह्वा में जिस विषय का राग पैदा हुआ, वह नष्ट हो जायेगा । श्रीदत्तात्रेय जी महाराज ने कहा है -
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद्विजितान्येन्द्रियः पुमान् ।
न जयेद् रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे ॥ (भा. ११/८/२१)
‘समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने पर भी जो लोग रसना पर विजय नहीं प्राप्त कर सके, उन्हें जितेन्द्रिय नहीं कहा जा सकता है ।’
उदर का वेग - उदर के वेग को रोकने के लिए साधक में भूख सहने की सामर्थ्य होनी चाहिए क्योंकि जीवन में कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ भी आती हैं कि जब खाने को कुछ नहीं मिलता है, उपवास भी करना पड़ता है, ऐसा नहीं कि भूख लगी तो कहीं भी पाने लग गए, साधक में खान-पान सम्बन्धी यह विवेक होना चाहिए ।
उपस्थेन्द्रिय का वेग - जननेन्द्रिय पर विशेष शासन करने की आवश्यकता है । यदि साधक समस्त अनर्थों को सर्वथा के लिए नष्ट
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करना चाहता है तो ब्रह्मचर्य अत्यावश्यक है । अगर साधक ब्रह्मचर्य नहीं धारण करेगा तो उसके हृदय में विषय लोलुपता बढ़ती चली जायेगी और वह विषय लोलुपता प्रियालाल के प्रेमरस में बाधक होती है । जैसे-जैसे साधक विषयस्वाद में आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे प्रियालाल की प्राप्ति की भावना नष्ट होती चली जायेगी । गीता जी में प्रभु ने कहा है कि जो धन-सम्पत्ति या भोगासक्त है, उसके हृदय में परमात्म प्राप्ति का निश्चय हो ही नहीं सकता है -
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ (२/४४)
अतः ये वेग सहने ही पढ़ेंगे, चाहे इस जन्म में सहो, चाहे हजार जन्मों में, इनको सहे बिना अनर्थ-निवृत्ति नहीं होगी और साधक आगे नहीं बढ़ पायेगा -
शक्रोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ (गी. ५/२३)
‘मृत्यु से पूर्व ही अर्थात् शरीर का नाश होने से पहले ही जो काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेगों को सहने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है और वही सुखी है ।’ जो साधक सहने में आनाकानी करेगा कि हमसे भजन नहीं होता है, हमसे ये वेग नहीं सहे जाते, हमसे प्रतिकूलता सही नहीं जाती, तो फिर उसे परमार्थ की प्राप्ति कैसे होगी ? वह तो फिर इस परमार्थ पर चलने लायक ही नहीं हैं । जो बलहीन पुरुष है, वह भगवत्प्राप्ति के योग्य नहीं रहता, ऐसा श्रुतियों में कहा है कि ‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः’ जिसके हृदय में ये भाव हो कि हम हर वेग को सहेंगे, हर कष्ट को सहेंगे, हर प्रतिकूल व्यवहार को सहेंगे तो वही सच्चा परमार्थ-पथ का पथिक है और उसे इसी जन्म में प्रभु की प्राप्ति हो जायेगी ।
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प्र०-महाराजश्री, हम सब साधकों की तरफ से एक प्रश्न है कि कोई भी ब्रह्मचर्य नाश की क्रिया न करने पर भी कुछ दिनों में ब्रह्मचर्य स्वतः क्षीण (स्वप्रदोष) हो जाता है, फिर हम बहुत चिन्तित होते हैं तो ये क्यों होता है, इससे बचने का उपाय क्या है और स्वप्रदोष होने पर भी क्या हम ब्रह्मचारी हैं ?
समाधान - हमने बाल्यावस्था में जो परमहंस स्थिति को प्राप्त महापुरुष हैं, उनसे प्रश्न किया था कि महाराज जी कोई भी काम चेष्टा न करने पर भी उपासक के शरीर से जो वीर्यपात होता है तो क्या उसका ब्रह्मचर्य क्षीण माना जाएगा और यदि क्षीण माना जाएगा तो वह क्यों निकलता है, जब उसकी कोई क्रिया नहीं है और उसे कैसे रोका जा सकता है ? तो उस समय उन्होंने साधारण शब्दों में बताया था कि वीर्य दो तरह से निकलता है, एक तो जो घातक है, वह उसी के शरीर से निकलेगा, जिसने पहले कभी हस्तमैथुन किया है अर्थात् कुसंग के कारण गंदी क्रियाएँ करके बालकावस्था से ही वीर्य को नष्ट किया है । हस्तमैथुन या अन्य गंदी चेष्टा करने वाला कुछ वर्षों तक यह नहीं जान पाता है कि इस क्रिया के द्वारा मेरी हानि हो रही है, क्योंकि जीवनी-शक्ति भगवान् अपनी ओर से देते हैं कोई विलकुल न खाए और हस्तमैथुन करे तो भी कुछ समय तक उसको समझ में नहीं आयेगा, कुछ समय के बाद जब उसकी स्थायी जीवनी शक्ति से क्षीण होना प्रारंभ हो जाएगा, तब उसके जीवन में वीर्य-हानि से होने वाले लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं, अब यदि वह किसी अच्छे संग के प्रभाव से हस्तमैथुन करना बंद कर देता है, तब भी उसका कुछ समय तक वीर्यपात (स्वप्रदोष) होगा; क्योंकि उसका अभ्यास बन गया है । दूसरी तरह का वीर्यपात वह है कि जब आप ठीक दिनचर्या से चल रहे हैं, कोई गंदी क्रिया नहीं करते हैं और न ही पहले कभी की अर्थात् जिसने
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कभी हस्तमैथुन आदि के द्वारा वीर्यपात किया ही नहीं तो उसका असली वीर्य कभी भी पात होगा ही नहीं ।
यदि आपने कभी हस्तमैथुन नहीं किया, किसी भी तरह से जननेन्द्रिय का घर्षण करके वीर्यपात नहीं किया तो संतानोत्पत्ति की क्षमता वाला आपका जो वास्तविक वीर्य है, वह स्वाभाविक निकल ही नहीं सकता । यदि आपने गंदी क्रियाएँ करके पहले उसे मार्ग दे दिया है तो फिर उसके निकलने का मार्ग हो गया है । तो परमहंस जी ने बताया कि एक होता है आप सो रहे हैं और आपको बिल्कुल पता नहीं, बिल्कुल कोई काम का संकल्प नहीं, कोई क्रीड़ा नहीं और आप जगे आपको ऐसा लगा कि वीर्यपात हो गया तो वो दोष नहीं है । जैसे जब गुड़ बनाया जाता है तो उसमें गंदा फेन निकलता है ऊपर, ऐसे ही ये शरीर का विकार निकला न कि ब्रह्मचर्य नष्ट करने वाला वीर्य । इसलिए उपासक को उसमें परेशान नहीं होना है क्योंकि आपके ब्रह्मचर्य का नाश नहीं हुआ; और यदि आप हस्तमैथुन या अन्य क्रियाओं के द्वारा वीर्यपात करते रहे हैं और आज आपने रोक दिया कि क्या आज से नहीं करूँगा तो वह तत्काल बंद नहीं हो जाएगा, वह वीर्य स्वल्पन कुछ समय तक चलेगा, अगर आप ठीक नियम से चलेंगे तो कम से कम छः महीने लगेंगे उसको कवर करने में और अगर आपने प्रमाद स्थिति की कि वहतो निकल ही जाता है, फिर हमको वीर्यपात करने से क्यों मना किया जाता है तो आप देख लेना कि कुछ समय बाद आपकी हालत बहुत गंभीर हो जाएगी, जो आप बता भी नहीं पायेंगे किसी से; क्या गंभीर हो जाएगी ? आप ऐसे ही साधारण सी क्रियाओं में ही ब्रह्मचर्य हीन हो जायेंगे । जननेन्द्रिय को छूते ही वीर्यपात होने लगेगा । ये सब बातें हम महापुरुषों के अनुभव और इस तरह की गंभीर हालत वाले लोगों से मिलकर ही बता रहे हैं ।
6/2/20
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