ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
DevanagariHindipublished380 पृष्ठ
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ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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“वीर्य ही सारे शरीर का सार है ।”
“मनुष्य का बल वीर्य के अधीन है ।”
“आज ही शरीर की धातुओं का तेज है ।”
( वैश्व )
“अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन कर लेने पर, सुलक्षण श्री से विवाह करना चाहिये ।”
( मिताक्षरा )
“जो मनुष्य ब्रह्मचारी नहीं उसको कभी सिद्धि नहीं होती । वह जन्म-मरणदि छेशों की बार-बार भोगता रहता है ।”
( अमृतासिद्ध )
“ब्रह्मचर्य से पाप इस प्रकार कटता है, जिस प्रकार सूर्योदय से अन्धकार का नाश होता है ।”
( धर्म-संमह )
ऊपर की सम्मलियाँ भावीन ग्रन्थों के श्लोकों के मर्म तथा कथानकों के अर्थ या भाव-रूप में संगृहीत की गयी हैं ।