भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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तूतीष्य स्वण्यु

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१—ब्रह्म-चन्द्रना

ॐ त्वां हि मन्दतममर्कशोकैर्वृमहे महि नः श्रोच्यन्ते । इन्द्रं न त्वा श्वत्सा देवता वायुं प्रणन्ति राधसानृततमाः॥

( ऋग्वेद ४।१।६१ )

हे प्रकाशमान परमेश्वर ! तुम कोमल हृदय वाले हो । इस-लिये ब्रह्मचर्य-पूर्वक अध्ययन किये हुये, वीर्यशाली मन्त्रों से हम तुम्हारी आराधना करते हैं । तुम हमारी प्रार्थना को सुनो ! इन्द्र और वायु के समान तुम्हारी पूजा भी संसार में होती है ।

तुम इन्द्र और वायु की भाँति इसलिये पूजित हो कि संसार तुम्हारे बिना अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर सकता । तुम्हारी कृपा से अमोघ पापों और दुष्कर्मियों का नाश होता है । ब्रह्मचारी लोग तुम्हारे तेज के लिये अपने व्रत से विचलित नहीं होते । तुम्हारे दिव्य गुणों से ही हमारा सदा कल्याण होता है । हम तुम्हारे ही द्वारा सुगन्धित पदार्थों को देवों तक भेज सकते हैं । हमको भी यही शक्ति दो, जिससे कि ब्रह्मचर्य से रह कर विश्व का उपकार करें । तुम्हारी कृपा से सब कुछ सम्भव है । तुम हमें भी श्रिय और निष्पाप बनाओ ! तुम से हमारी यही प्रार्थना है ।