भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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२—ब्रह्मचर्याश्रम

“ब्रह्मचर्याश्रमो ज्येष्ठः, श्रेष्ठश्चैव तथाविधम् ।” (वृत्ति)

ब्रह्मचर्याश्रम सब आश्रमों (गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) से ज्येष्ठ और उसी प्रकार श्रेष्ठ भी है।

“स्वाध्ं यत्प्रथमे कमः, सुखाध्ं तत्तु सर्वदा ।” (नीति)

पहले पहल जो कार्य सिद्ध हो जाता है, वह सर्वदा सुखाध्य होता है।

ब्रह्मचर्याश्रम विद्यार्थी की वह अवस्था है, जिसमें वह प्रविष्ट होकर, नियमित समय तक वीर्य-रक्षा सहित विद्याभ्यसन करता है। इस आश्रम में प्रविष्ट होने पर, वह माता-पिता से दृष्ट्युक्त हो कर गुरु-कुल या ऋषि-कुल में वास करता है। आयुष्य का कम से कम प्रथम भाग उसे इसी संयमशील अवस्था में बिताना पड़ता है।

प्राचीन समय में यह आश्रम बड़ा महत्वशाली समझा जाता था। राजा-मन्त्रा सब के पुत्र यथासमय इस आश्रम के अधिकारी बनाये जाते थे। जब तक वे इस अवस्था को पार नहीं कर लेते थे, वे गृहस्थाश्रम के योग्य नहीं समझे जाते थे।

वतस्तोऽवस्थाः शरीरस्य दृढिर्द्यौवनं सम्पूरणं किञ्चित्पि दृणुमिच्छेति । आपोढयाहू वृद्धिः । आपञ्चक्षित्येत्यौवनं । आचत्वारिंशत्तः सम्पूरणं ततः किञ्चित्पिदृणुमिच्छेति ॥ (सुश्रुताचार्यः)

इस शरीर की चार अवस्थाएँ होती हैं। वृद्धि, यौवन, सम्पूरण और परिदृणु। १६ वें वर्ष से २५ वर्ष तक सब प्रायुषों की