भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 144

१४१

ब्रह्मचर्य युक्त अन्याश्रम

वृद्धि होती है। २५ वें वर्ष के पश्चात् ४० वें वर्ष तक सब धातुओं के पुष्ट हो जाने से जीवन प्राप्त होता है। ४० वें वर्ष के उपरान्त ( ६० वर्ष तक ) सम्पूर्णता रहती है। तत्पश्चात् हास्य आरम्भ हो जाता है।

यही कारण है कि कम से कम २५ वर्ष तक ब्रह्मचर्याश्रम का पालन किया जाता था। बहुत से विद्यार्थी इस आश्रम का महत्व समझ लेने पर, इससे अधिक समय तक या जीवन पर्यन्त इसी आश्रम में रहते थे।

३—ब्रह्मचर्य युक्त अन्याश्रम

ब्रह्मचर्य परि समाप्य गृही भवेत्।

गृहीभूत्वा वनी भवेत्। वनीभूत्वा प्रवजेत्।

( ब्रह्मज्ञ जावालि )

ब्रह्मचर्याश्रम का पालन कर लेने पर गृहस्थ बने। गृहस्थाश्रम का निर्वाह करके वनी हो। और वानप्रस्थाश्रम को समाप्त कर लेने पर सन्यासी बने।

“ब्रह्मचारी गृहीः वानप्रस्थो सिद्धिस्तुष्टये।”

( मनीषी अमर )

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी—ये चार आश्रमों के नाम हैं।

ब्रह्मचारी गृहस्थश्च, वानप्रस्थो यत्पितृत्था ।

पते गृहस्थ प्रभवच्छत्वारः पृथगाश्रमाः ॥

ब्रह्मचर्य विज्ञान · पृष्ठ 144, कुल 380 में से · BharatKosha