ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी—ये पृथक्-पृथक् चार आश्रम गृहस्थ से उत्पन्न हुये हैं ।
मनुष्य की साधारण आयु १०० वर्षों की मानी गई है ! इस प्रकार इसके चार चरणों पर विभाग किये गये हैं । उन्हीं के अत्येक भाग को धर्म-शास्त्र के मत से आश्रम कहा जाता है ।
(१) ब्रह्मचर्याश्रम
उपनीतो माणवको, वसेद्गुरुकुलेषु च ।
गुरोः कुले प्रियं कुर्यात्कर्मणा मनसा गिरा ॥
( धर्मज्ञ हारीत )
उपनयन के हो जाने पर बालक को गुरुकुलों में जाकर रहना चाहिये । वहाँ मन, वचन और कर्म से गुरु के परिवार का हित करना चाहिये ।
पहला आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम के नाम से पुकारा जाता है । व्रत-वन्ध करके पिता अपने पुत्र को किसी सुयोग्य आचार्य को समर्पित कर देता है । यहाँ वह बालक आयुष्य का पहला भाग ( २५ वर्षतक ) विद्याध्ययन, गुरु-सेवा और सदाचार-पालन में व्यतीत करता है । इतने काल में उसकी शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ पूर्ण रूप से विकसित हो जाती हैं और वह गृहस्थाश्रम में आने के लिये योग्य बन जाता है ।