ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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गृहस्थाश्रम
( २ ) गृहस्थाश्रम
चतुर्थ मासुपो भागसुपित्त्वात् गृहैद्विजः । द्वितीय मासुपो भार्ग, छतदारो गृहचसेव ॥
( षोडीचार्यं मनु )
आयुष्य के चार विभाग का प्रथम भाग गुरुकुल में बिता कर, उसके द्वितीय भाग में विवाह कर गृहमें वास करे ।
दूसरा आश्रम गृहस्थाश्रम है । इसमें पहले आश्रम की सफलता देखलाई जाती है । इसका काल, आयुष्य का दूसरा भाग (२५ से ५०) तक है । गृहस्थ का अर्थ—गृह में रहने वाला होना है । इस आश्रम के कर्तव्य-कर्मों का भी नीचे उल्लेख किया जाता है:—
१—धर्म के साथ आजीविका के लिये धन एकत्र करना ।
२—सुपार्थों को दान दे कर संसार का हित करना ।
३—नित्य अपने घर में अभिहीन करना ।
४—पति-पत्नी में परस्पर प्रेम और सहकारिता का भाव रखना ।
५—बालकों का यथा योग्य पालन-पोषण करना तथा शिक्षा का प्रवन्ध करना ।
६—देव-पूजन, माता-पिता की सेवा, वेद का पठन-पाठन, जीवों को रक्षा और अतिथि-सत्कार करना ।
६—खरल और सदाचार युक्त जीवन व्यतीत करना ।
७—ईश्वर और धर्म पर विश्वास रख कर कार्य करना ।