ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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८—अनाचारों से बचने के लिये सदैव नियम-पूर्वक रहना ।
९—सत्य, शील और सज्जता का परिचय देना ।
१०—परोपकार, दया, ज्ञान तथा उच्च विचारों में रत सदैव रहना ।
( ३ ) वान-प्रस्थाश्रम
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वली पलित मात्मनः । अपत्यस्यैवचापत्यं, तदारण्यसमाश्रयेत् ॥
( वर्माचार्य मञ्जु )
गृहस्थ जब अपने शरीर को शिथिल देखे और पुत्र को भी पुत्र हो जाय, तब वन में प्रवेश करे ।
तीसरा आश्रम वान-प्रस्थाश्रम कहलाता है । इस में पहले कहे हुये, दोनों आश्रमों से बिरक्ति होने लगती है । इसका समय आयुष्य का तीसरा भाग (५० से ७५ तक) है । वानप्रस्थ का अभिप्राय ही—वन में बसने वाला है । अब हम इस आश्रम के मूल कर्तव्यों का भी नीचे वर्णन करते हैं:—
१—वन में कुटी बना कर रहे और प्रकृति के तत्वों का निरीक्षण करे ।
२—संसार के कल्याण के लिये विद्यार्थियों को विद्या-दान दे ।
३—पशु-पक्षी आदि सब को प्रेम-की दृष्टि से देखे ।
४—फल, मूल आदि को खाकर अपना जीवन-निर्वाह करे ।