ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
अक्षरचर्य-विज्ञान
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८—अनाचारों से बचने के लिये सदैव नियम-पूर्वक रहना ।
९—सत्य, शील और सज्जता का परिचय देना ।
१०—परोपकार, दया, ज्ञान तथा उच्च विचारों में रत सदैव रहना ।
( ३ ) वान-प्रस्थाश्रम
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वली पलित मात्मनः । अपत्यस्यैवचापत्यं, तदारण्यसमाश्रयेत् ॥
( वर्माचार्य मञ्जु )
गृहस्थ जब अपने शरीर को शिथिल देखे और पुत्र को भी पुत्र हो जाय, तब वन में प्रवेश करे ।
तीसरा आश्रम वान-प्रस्थाश्रम कहलाता है । इस में पहले कहे हुये, दोनों आश्रमों से बिरक्ति होने लगती है । इसका समय आयुष्य का तीसरा भाग (५० से ७५ तक) है । वानप्रस्थ का अभिप्राय ही—वन में बसने वाला है । अब हम इस आश्रम के मूल कर्तव्यों का भी नीचे वर्णन करते हैं:—
१—वन में कुटी बना कर रहे और प्रकृति के तत्वों का निरीक्षण करे ।
२—संसार के कल्याण के लिये विद्यार्थियों को विद्या-दान दे ।
३—पशु-पक्षी आदि सब को प्रेम-की दृष्टि से देखे ।
४—फल, मूल आदि को खाकर अपना जीवन-निर्वाह करे ।
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सन्ध्यासाश्रम
५—नाना प्रकार की विद्याओं और विद्यानों का आविष्कार करे ।
६—सर्वदा संयम और सदाचार से अपने शरीर को शुद्ध और आत्मा को उन्नत बनावे ।
७—व्रत और हवन से अपने हृदय और बुद्धि को शान्त और तीव्र बनावे ।
८—धर्म-कर्म का आदेश गृहस्थों को भी देता रहे ।
९—इन्द्रिय-दमन और योगाभ्यास को हृदय करे ।
१०—परमात्मा के ध्यान और चिन्तन में मन को रसाता रहे ।
(४) सन्ध्यासाश्रम
वनेषु च विहृत्यैव, तृतीयं भागमाशुषः ।
चतुर्थमाशुपोभागं, त्वयस्त्वासङ्गपरिव्रजते ॥
(धर्माचार्य मनु )
इस प्रकार आशुष्य का तीसरा भाग वनों में वित्त कर उस के चौथे भाग में ( ७५ से १०० तक ) सब प्रकार के सन्ध्याओं को त्याग कर सन्ध्यासी हो जाय ।
चौथे आश्रम का नाम सन्ध्यासाश्रम है । यह अश्वितम आश्रम है । इस में पहले कहे गये तीनों आश्रमों के कर्मों का भी त्याग हो जाता है । सन्ध्यास का अर्थ है—सम्पूर्ण रीति से त्याग ।
इस आश्रम के प्रधान कर्तव्यों का वर्णन नीचे किया जाता है—
१—शरीर-रक्षा के लिये अल्प तथा सात्विक आहार करना ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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२—एक स्थान पर न रह कर देशाटन करना । ३—अपने पवित्र विचारों से संसार का हित करना और दोषों को दूर करना । ४—अपने मन को शुद्ध रख कर आचरण करना । ५—काम, क्रोध, लोभ, मोहादि विकारों से दूर रहना । ६—न जीने की इच्छा और न मरने का भय करना । ७—सत्य बात कहना और कभी मिथ्या का आश्रय न लेना । ८—प्राणि-मात्र पर दया रखना और सुख-दुःख को समान मानना ।
५—तृष्णाशील, शान्त, आत्मचिन्तक और ब्रह्मज्ञ बनना । १०—योगाभ्यास और द्वैधर-स्मरण में अपना समय श्रियाना ।
५—ब्रह्मचर्ययुक्त वर्ण-व्यवस्था
“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं, गुण-कर्म-विभागशः ।”
( श्रीमद्भगवद्गीता )
चारों वर्णों की रचना, उनके गुण और कर्म के विभाग के अनुसार की गई है ।
ब्राह्मणोऽस्य सुखमास्तीदृ वाह्व राज्यन्यः कृतः ।
ऊरुतद्वस्थं यद् वैश्यः पद्भ्यो ५ शुद्धो अजायत ॥
( भगवद्गीता )
परम पुरुष के सुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, ऊरु से वैश्य और पग से शुद्ध उत्पन्न हुए हैं । सारांश यह कि ज्ञान, बल, धन और सेवा-प्रधान, मनुष्य-जाति के चार विभाग बनाये गये ।
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ब्रह्मचर्ययुक्त वर्ण-व्यवस्था
१. ब्राह्मण
अध्यापन मध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रति ब्रह्महन्वेव, ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥
( मनुस्मृति )
पढ़ना, पढ़ाना, यह करना, यह कराना, दान देना और दान लेना—ये ब्राह्मण के कर्म हैं । ११
शमो दमस्तपः शौचं, शान्तिराजं मेवच । ज्ञानं विज्ञानमस्तिदयं, ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥
( श्रीमंगवद्वर्णाता )
मन की शान्ति, इन्द्रियों का दमन, जितेन्द्रियता, पवित्रता, च्छमा-शीलता, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता—ये ब्राह्मण के स्वाभाविक गुण हैं ।
२. क्षत्रिय
प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्वनमेवच । विपयेष्व प्रसक्तिश्च, क्षत्रियस्य समासतः ॥
( मनुस्मृति )
प्रजा-रक्षण, दान देना, यह करना, अध्ययन करना, जितेन्द्रिय रहना—ये क्षत्रियों के संक्षिप्त कर्म हैं ।
शौर्यं तेजो धृतिर्दक्ष्यं, युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च, ब्राह्म कर्म स्वभावजम् ॥
( श्रीमंगवद्वर्णाता )
शूरता, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध में दृढ़ता, दान, और आस्तिकता—ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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३. वैश्य
पशुनां रक्षणं दानं मिज्याध्ययनं मेवच । वशिष्कपथं कुत्सीदक्ष, वैश्यस्य क्विरेवच ॥
( मनुस्मृति )
पशुओं का संरक्षण, दान देना, यज्ञ करना, पढ़ना, व्यापार करना, और सूद लेना—ये वैश्य के कर्म हैं ।
४. शूद्र
एकमेव तु शूद्रस्य, प्रभुकर्मसमादिशत् । पतेपामेव वर्णानां, शुश्रूषा मनुसूयथा ॥
( मनुस्मृति )
शूद्र का एक ही कर्म निर्धारित किया गया है कि ऊपर कहे गये वर्णों की बहुत संयमशीलता से सेवा करते रहें ।
द्विजातियों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) को तो उपनयन, ब्रह्मचर्य और वेदाध्ययन का प्रत्यक्ष रूप से अधिकार है । तीनों वर्णों के कर्म भी ऐसे हैं, जो बिना ब्रह्मचर्य पालन किये कदापि नहीं चल सकते । अब रहे शूद्र, यदि वे भी ब्रह्मचर्य से न रहें तो उन्हें भी सेवा कार्य का सुचारु-रूप से निर्वाह करना परम कठिन है । क्योंकि योगिवर भर्तृहरि का कहना है कि सेवा-धर्म अत्यन्त कठिन है, उसका पालन करना योगियों को भी दुर्लभ होता है ।
मनुष्य-शरीर में भी प्रकृति से चारों वर्णों की व्यवस्था की है। ज्ञान, बल, ऐश्वर्य और सेवा-कार्य के बिना एक क्षण भी इसकी स्थिति
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गुरुकुल-ऋषिकुल
नहीं हो सकती। इसलिये इस प्रकार भी यह बात स्वाभाविक है कि ब्रह्मचर्य-व्रत से इस चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति की जाय !
६—गुरुकुल-ऋषिकुल
“विद्यायाति गुरोः कुले ।”
( षुक् )
विद्यार्थी को गुरुकुल में विद्या की प्राप्ति होती है ।
“ऋषयो मन्त्र-द्वाराः ।”
ऋषि लोग हित की बात विचारने वाले थे, या संसार को शिखा देते थे ।
आर्य-सभ्यता के समय में हमारे इस देश में स्थान-स्थान पर गुरुकुल और ऋषिकुल थे । ‘गुरुकुल’ और ‘ऋषिकुल’—उस स्थान को कहते हैं, जहाँ गुरु या ऋषि का परिवार रहता था ।
वह गुरुकुल या ऋषिकुल उस स्थान पर रहता था, जो जल-वायु की दृष्टि से सर्वोत्तम ठहरता था । यह प्रायः हरे-भरे वनों या उर्वरा पान्दीय भूमि पर होता था । यहाँ नाना प्रकार के स्ना-स्थ्य कारक वृक्ष, फल और फूलों की अधिकता होती थी । भिन्न-भिन्न जाति के पशु और मनोहर शब्द करने वाले पक्षियों को आने जाने की पूर्ण स्वाधीनता रहती थी ।
इस एकान्त स्थान में गुरु या ऋषि लोग अपनी पत्नी और सन्तान सहित निवास करते थे । बहुत से ऐसे भी रहते थे, जिनके पास पत्नी और सन्तान नहीं रहती थी ।
गुरु ने लोगों होते थे, जो ब्रह्मचर्याश्रम और गृहस्थाश्रम का
प्रहस्य-विज्ञान
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विधिवत् पालन कर, वान-प्रस्थाश्रम में प्रवृष्ट होते थे । वे यथा समय पुत्र और पौत्रों को गृह पर छोड़ कर, इस आश्रम में पशु-रते थे । वे पत्नी को भी त्याग देते थे, या उनके स्वीकार करने पर अपने साथ रखते थे । उनके आयुष्य का रूची या शेष सम्पूर्ण भाग ब्रह्मचारियों के विद्या-दान और सद्वृत्तान के चिन्तन में व्यतीत होता था ।
ऋषि लोग वे होते थे, जो सद्वै ब्रह्मचारी रह कर, लोक का कल्याण करते थे । विद्या-दान को वे सब से बड़ा पुण्य समझते थे । इसलिये वे प्रायः विद्यार्थियों को अपने यहाँ रखकर वेदवत्था वेदाङ्गों की शिक्षा देते थे । विवाह उनकी इच्छा पर निर्भर रहता था । उनका जीवन परम पवित्र और सात्त्विक होता था । विद्यार्थी लोग उनके अनुकरण से अपने को योग्य बनाते थे ।
गुरुओं और ऋषियों के सिद्धान्त प्रायः एक से थे । गुरु लोगों की अपेक्षा ऋषि लोग अधिक निःस्वार्थी होते थे । सपत्नीक रहने के कारण गुरुओं को विशेष आवश्यकता रहती थी, पर ऋषियों को विशेष मुश्कता थी ।
इन गुरुकुलों और ऋषिकुलों में राजा तथा अन्य धर्मात्मा पुरुष ब्रह्मचारियों के दर्शन के लिये आते थे और उचित सहायता देने के लिये प्रार्थना करते थे । विद्यार्थी और गुरु सभी स्वात्मानन्दमयी होते थे । वे अपने लिये परिश्रम और पुरुषार्थ से स्वयं वृत्ति-उपाजित कर लेते थे ।
इस गुरुकुल और ऋषिकुल-प्राणाली से देश और समाज का बड़ा लाभ होता था । राजा को शिक्षा-विभाग नियत करने की आवश्यकता न थी । प्रजा को शिक्षा के लिये कुछ नहीं उठाना
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उपनयन-संस्कार
पड़ता था। राजा और प्रजा दोनों गुरुकुल तथा ऋषिकुल का स्वतः सेवा किया करते थे।
जब से इस देश में गुरुकुल और ऋषिकुल की प्रणाली नष्ट हुई, तब से ब्रह्मचर्य और विद्या का लोप ही होता गया। आज कल की विद्यालय-प्रथा से शांताश लाभ भी नहीं होता। गुरुकुल काँगड़ी, ऋषिकुल हरद्वार, शान्ति निकेतन बोलपुर, सत्याग्रह आश्रम अहमदाबाद और कन्या-गुरुकुल दिल्ली से कुछ जनता का हित-साधन हो रहा है, पर इस देश की जन-संख्या को देखते हुये, अभी नितान्त अभाव जान पड़ता है। इन स्थानों में भी अभी प्राचीन आदर्शों की पूर्ति नहीं की जाती। इनके सञ्चालन में भी अभी प्राचीनता की बहुत कमी है। ये नवीन युग के अनुकूल चलने के उद्योग में हैं। हम इनका विरोध तो नहीं करते, पर इतना अवश्य कहेंगे कि ब्रह्मचर्य और विद्या की उन्नति के लिये, इनके पास अपूर्णे साधन हैं। अतएव हमारा विचार है कि वीर्य-रक्षा, विद्याध्ययन, संसार-सेवा और सुखार्थ्य की कामना से पुनः उस गुरु-कुल और ऋषि-कुल-प्रणाली का उद्धार करना चाहिये।
६—उपनयन-संस्कार
“संस्कारात्प्रबला जातिः।”
संस्कार के प्रभाव से जाति को प्रबला प्राप्त होती है।
“उपनीतो माणवको, वसेद्गुरुकुलेषु।”
उपनयन-संस्कार के हो जाने पर, ब्रह्मचारी गुरुकुलों में जा कर वास करे।
ब्रह्मचर्य-विधान
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यज्ञोपवीत संस्कार बड़े महत्व का है । इस संस्कार के साथ ही बालक का ब्रह्मचर्याश्रम प्रारम्भ होता है ।
इस संस्कार की प्रणाली वैदिक है । बिना इसके बालक वेद का अधिकारी नहीं होता । प्राचीन काल में इस संस्कार के हो जाने पर, माता-पिता अपने बालकों को गुरुकुलों में भेज देते थे । उपनीत बालक को उसका आचार्य वेद पढ़ाता था ।
प्रायः सभी स्थितियों में केवल द्विजाति को ही यज्ञोपवीत का अधिकारी माना है । मनुस्मृति में बालक के यज्ञोपवीत-काल का इस प्रकार विधान किया गया हैः—
गर्भाष्टमाष्ट्येऽकुर्वीत, ब्राह्मस्योपनायनम् । गर्भादेकादशोराहो, गर्भास्तु ब्राह्मविशः ॥
गर्भ से आठवें वर्ष में ब्राह्मण का, ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का और बारहवें में वैश्य का उपनयन करना चाहिये ।
ब्रह्मचर्यसंस्कारमस्य, कार्यं विप्रस्य पञ्चमे । राहो बलायिनिः पण्डे, वैश्यस्येहाथिनोऽष्टमे ॥
ब्रह्मज्ञेन की कामना से ब्राह्मण का पाँचवें वर्ष में, बलोत्साह की इच्छा से क्षत्रिय का छठे में और धनैश्वर्य के सनोरय से वैश्य का आठवें में उपनयन कर देना योग्य है ।
आपोऽहशष्ट ब्राह्मणस्य, सावित्रो नाति वर्सते । आह्वविशतुमवन्धो राचतु विशते विश्वम् ॥
सौत्रह वर्ष के पश्चात् ब्राह्मणों को, बाइस के पश्चात् क्षत्रियों को और चौबीस के पश्चात् वैश्यों को सावित्री ( गायत्री मन्त्र ) का उपदेश नहीं किया जा सकता ।
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उपनयन-संस्कार
यदि उपर्युक्त वर्णों से पूर्व यज्ञोपवीत न हुआ, तो वह बालक पवित्र हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि वह ब्रह्मचर्य और वेदाध्ययन के योग्य यहीं रह जाता। यिना यज्ञोपवीत के वह गुरुकुलों में भेजा नहीं जा सकता और अवस्था अधिक हो जाने से वह बालक कुसंस्कारी हो जाता है। अधिक अवस्था वाले बालक पर आचार्य अपना प्रभाव नहीं डाल सकता। जब कुसंस्कार दृढ़ हो जाते हैं, तो उनका दूर करना बड़ा कठिन हो जाता है। इसीलिये ब्रह्मचारी के लिये यज्ञोपवीत-सूत्र के अतिरिक्त शृंगचर्म, मेखला और दण्ड—ये तीन वस्तुयें भी आवश्यक हैं। भगवान् मनु ने इनका भी विधान वर्ण-क्रम के अनुसार भिन्न-भिन्न भाँति का किया है।
यज्ञोपवीत धारण करने का अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचारी अपने ब्रह्मचर्य, वेदाध्ययन और गुरु-शुश्रूषा में दृढ़ प्रतिज्ञता, उच्च-मता और क्षमता को प्राप्त करे। शृंगचर्म का यह अभिप्राय है कि पवित्रता, निःस्वार्थपरायणता और स्वाधीनता—पूर्वक वह अपना समय व्यतीत करे। मेखला का यह अभिप्राय है कि वह अपने अनुष्ठान में कटिबद्धता, नियमितता और धार्मिकता से लगा रहे, और दण्ड का यह अभिप्राय है कि उन्नत तथा उच्च विचारों से आत्म-दमन, शरीर-संरक्षण और निर्भौकत्व के लिये प्रयत्न करता रहे।
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ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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७—यज्ञोपवीत-विधि
“आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः ।”
( भगवद्गीता )
आचार्य उपनयन किये हुए ब्रह्मचारी को अपने संस्कार में रखता है ।
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं.
प्रजापते यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमर्धं प्रतिमुखं शुभ्रम्,
यज्ञोयवीतं बलमस्तु तेजः ॥
( प्रतबन्ध )
यज्ञोपवीत अत्यन्त पवित्र है । यह ब्रह्मा के आगे ही उत्पन्न हुआ । यह आयुष्य देने वाला है—स्वच्छ है । इसे धारण करो ! यह बल और तेज को बढ़ाता है ।
उपनयन-संस्कार की विधि भी बड़े उत्तम रहस्यों से भरी हुई है । इस संक्षेप में उसके मुख्य अङ्कों का वर्णन यहाँ पर कर देना चक्षित समझते हैं—
उपनयन से ब्रह्मचर्याश्रम का प्रारम्भ होता है । इसलिये इसका नाम ‘ब्रह्मादेश’ भी है । बालक का चौर-कर्म कराकर स्नान से शुद्ध होने पर, अग्नि में हवन कराया जाता है ।
तरपश्चात् अग्नि के समीप उभे यज्ञोपवीत धारण कराकर गायत्री-मन्त्र का उपदेश किया जाता है । इस समय भुगवम, मेखला, दण्ड और कौपीन उसे धारण करना पड़ता है । आचार्य अग्नि की उत्तर दिशा में पूर्वाभिमुख होकर बैठता है और
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यहोपवीत-विधि
अपनी अँजली में जल लेकर सविता के मन्त्र से विन्दु-चिन्हु कर शिष्य की अखलि में गिराता है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि तुम नम्रता-पूर्वक हमारी रक्षा में रहोगे, तो इसी प्रकार क्रमशः हम तुम्हें अपनी सारी विद्या पढ़ावेंगे। फिर कहता है कि सविता ने तेरा हाथ पकड़ा है और अग्नि तेरा आचार्य है। इसका अभिप्राय यह है कि तू तुर्य की भाँति तेजस्वी और अग्नि की भाँति पवित्र ब्रह्मचारी बन। फिर आचार्य बालक को सूर्य के दर्शन करा के प्रार्थना करता है।
तत्पश्चात् आचार्य बालक के हृदय पर दाहिना हाथ धरकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़ता है:—
ॐ मम मते ते हृदयं संदधामि। मम चित्तमनुचिन्नं ते अस्तु। मम वाचमेक मनाञ्चपस्व। बृहस्पतिस्त्वा नियुनपञ्च महाम्।
मेरे सदाचार के अनुकूल तेरा हृदय हो। मेरे चित्त का अनुसरण तेरा चित्त करे। मेरी वाणी का अनुकरण तेरी वाणी करे। विद्या के देव बृहस्पति तुम्हें मेरे सङ्ग नियुक्त करें।
आचार्य फिर ब्रह्मचारी का दाहिना हाथ पकड़ कर पूछता है:—
आचा०—को नामासि (तेरा क्या नाम है)
ब्रह्म०—अमुक शर्माऽहम्! (मेरा अमुक नाम है)
आचा०—कस्य ब्रह्मचार्यसीति? (तू किसका ब्रह्मचारी है)
ब्रह्म०—भवत इति। (मैं आपका ब्रह्मचारी हूँ)
आचा०—इन्द्रस्य ब्रह्मचार्यस्य श्रिराचार्यस्त्वाहमनाचार्यः।
जैसे इन्द्र ब्रह्मचारी है और उसका आचार्य अग्नि है, उसी प्रकार मैं तेरा हूँ।
ब्रह्मचर्य-विद्यान
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८—ब्रह्मचारी की प्रतिज्ञा
ब्रह्मवन्धु हो जाने पर बालक की संज्ञा ब्रह्मचारी हो जाती है। उसे गुरुकुल में जाने की आज्ञा मिलती है। उस समय वह बहुत सी बातों को, सबके सामने प्रतिज्ञा करता है। वह प्रतिज्ञा वास्तव में देखने ही योग्य है। उस प्रतिज्ञा का सारंश श्रीमान् पं० सूर्य नारायणजी आचार्य, जयपुर ने सुन्दर पद्यां में वर्णित किया है। पाठकों के लाभार्थ उसे इस यहाँ उद्धृत करते हैं:—
कविता
मैं ब्रह्मकुल का बालक बनता हूँ ब्रह्मचारी । पढ़ने को वेद विद्या करता हूँ मैं तयारी ॥ आचार्य ने कृपा कर उपनीत कर दिया है ॥ मन्त्रों से होम करने पावन मुझे किया है ॥ गुरुमंत्र का सदा ही करता रहूँगा जब मैं । सद्बुद्धि के उद्युहित करता रहूँगा तप मैं ॥ अस्त्रों मुझे कृपा कर देना वही सुमेधा । भ्याते जिसे पितर हैं सब देव श्री सुवेधा ॥ रक्षा सदैव करना गायत्री वेद मातः । करता हूँ ध्यान तेरा सार्य तथैव प्रातः ॥ मैं सूर्य के उदय से पहले सदा जगूँगा । बाहर नगर से जाकर शौच-किया करूँगा ॥ मूल सूत्र-इन्द्रियों को धोऊँगा मृत लगा कर । मैं ज्ञान-मन्त्र सारे पढ़ लूँगा चित्त लगाकर ॥
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ब्रह्मचारी की प्रतिज्ञा
मैं ज्ञान कर कुशासन फौरव विद्या जचूँगा । ध्या करके ब्रह्मज्योतिः पायीं ले मैं यचूँगा ॥
गुरु-मंत्र से शिक्षा को वाँचूँगा नित्य ही मैं । फिर आचमन करूँगा सब धर्म कृत्य ही मैं । करके सुम्राण संयम अघमर्षणादि जप के । ध्याऊँगा सूर्य को मैं होगे जो धाम तप के ॥ जप से निःश्रुत होकर गुरु वन्दना करूँगा । संमुख सदैव गुरु के भिक्षा मैं ला धरूँगा ॥ आका गुरु को पाके श्रुति शास्त्र मैं पढ़ूँगा । करने को देश सेवा आगे सदा चढ़ूँगा ॥
खोऊँगा भूमि पर ही पीछूँगा शुद्ध पानी । सात्विक करूँगा भोजन जिससे वचूँगा क्षात्री ॥ यशु-मांस का विवर्जन है मुख्य धर्म मेरा । शास्त्रोक्त होम विधि ही है मुख्य कर्म मेरा ॥
मिथ्या कभी न बोल्हूँ प्रण को कभी न तोड़ूँ । धर्मार्थ कष्ट गो जी आये तो मुँह न मोड़ूँ ॥ सहकर के शीत-दर्रा तन को सुदृढ़ बनाऊँ । परमार्थ में ही अपना सर्वस्व मैं लगाऊँ ॥
स्त्री-संग से सदा ही वचता रहूँगा स्वामित्र । सद्ग्रंथ मैं सदा ही रचता रहूँगा स्वामित्र ॥ कर करके वीर्य-रक्षा तन-भन करूँगा पक्का । धरती पै डाल दूँगा दुष्टों को देके धक्का ॥ विद्या-कला का संचय मैं आज कर रहा हूँ । हृत्कोष मैं सुमति का पीयूष भर रहा हूँ ॥
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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देकर के वेद-विद्या गुरु जब बिदा करेंगे। गुरु-दक्षिणा भी कुछ हम चरणों में ला धरेंगे ॥ कैसा परम मनोहर होगा अहो ! समय वह। आचार्य्य दैंगे मुझको करके रुपा अभय वह ॥ प्रेमाश्रु की सुधारा नयनों से वह चलेगी। गुरु से विमुक्त होते हस्तों को मति मलेगी ॥
६—आचार्य के दिव्योपदेश
“आचार्यो ब्रह्मचारी।”
(अथर्ववेद)
आचार्य ब्रह्मचारी (सदाचार का पालन करनेवाला) होता है, या यों कहिये कि आचार्य सद्ज्ञान का उपदेश देता है।
“वेद-श्रुतानादाचार्य, पितरं पत्निच्छति।”
(धर्मसूत्र मनु)
वेद-विद्याओं के पढ़ाने के कारण आचार्य पिता करके माना गया है।
बालक का विधि-विहित यज्ञोपवीत-संस्कार हो जाने पर उसके माता-पिता उसे गुरु-कुल में वेद पढ़ने के लिये प्रवृष्ट करा देते हैं। वहाँ वह अपने आचार्य को पिता मान कर उसकी संरक्षकता में समय व्यतीत करने लगता है। इस अवस्था में आचार्य उसके हित के लिये नाना प्रकार के दिव्य उपदेश देता है। इस कर्तव्य के सम्बन्ध में वेद-परक तैत्तिरीय उपनिषद् में इस प्रकार लिखा है:—
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आचार्य के दिव्योपदेश
वेदरतुल्याचार्योंऽमन्तेषादिनि मनुष्यास्तिः—
आचार्य अपने ऋद्धाचारी शिष्य को इस प्रकार शिक्षा देता हैः—
सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः ।
है पुत्र ! तू सत्य बोलना । धर्म पर चलना और स्वाध्याय (पाठ) में प्रमाद न करना ।
आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सी ।
पूर्ण ऋद्धाचर्य से जिद्याध्ययन के समाप्त होने पर आचार्य को दक्षिणा देकर, सन्तानोत्पत्ति के लिये गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना।
सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् ।
प्रमाद-वश होकर सत्य से विमुख न होना, प्रमाद के कारण धर्म को न त्याग देना और प्रमाद-युक्त हो कर सत्कर्म को न खो बैठना ।
भृत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
अपने ऐश्वर्य की वृद्धि में प्रमाद न करना—अपने पठन-पाठन में असावधानता मत करना और देव तथा पितरों के कार्य से विरक्त न होना ।
मातृदेवो भव । पितु देवो भव । आचार्य देवो भव । अतिथि देवो भव ।
अपने माता-पिता, आचार्य तथा अतिथि का सत्कार करना । यान्यनवधानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । जां कर्म दीप-रहित हों, उनका पालन करना । दुष्कर्मों का कभी नहीं !
यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्थानि नो इतराणि ।
मृगचर्य-विज्ञान
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जो हमारे अच्छे आचरण हों, उनका अनुकरण करना। कुचरियों का नहीं !
ये, के चासमच्छेया ५ सो ब्राह्मणस्तेषां त्वयासनेन प्रभव- सितव्यम् ।
जो लोग हममें उत्तम ब्राह्मणानी हैं, वन्हीं के सत्सङ्ग का विद्यास करना !
अन्द्रया देवम् । अश्रद्धया देवम् । श्रिया देवम् । ह्रिया देवम् । भिया देवम् । सविदा देवम् ।
अद्वा से देना—अश्रद्धा से देना—शोभा से देना—लज्जा से देना—और प्रतिष्ठा से दान देना चाहिये ।
अथ यदि ते कर्म विचिकित्सा वा वृत्त विचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्धिनो युक्ता अयुक्ता अलुक्ता धर्म कामाः स्तुर्यथा ते तत्र वर्त्तन्तः, तथा तत्र वत्तथाः ।
कभी कर्म या ज्ञान सम्बन्धी संशय उपरिथत हो, तो ऐसी अवस्था में ब्राह्मणानी, पक्षपात-रहित, योगी, अयोगी, दयावार और धर्म के प्रेमी वहाँ जैसा आचरण करते हों, वैसा ही आचरण करना योग्य है ।
एष आदेशः, एष उपदेशः, एषा वेदोपनिषद् । पतदनुशास- नम् । एवमुपासितव्यम् । एवमुचेतदुपास्यम् ।
यही आशा है, यही उपदेश है तथा यही वेद और उपनिषद् की शिक्षा है । यही करना चाहिये । इसी प्रकार के सदाचार का पालन कर्तव्य है ।
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पठन-पाठन के आदेश
१०---पठन-पाठन के आदेश
“पालनीया गुरोराद्या ।”
( सूक्ति )
गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिये ।
“सर्वेषां मेघदानानां, विद्यादानं विशिष्यते ।”
( भौति-शास्त्र )
सब प्रकार के दानों में विद्यादान श्रेष्ठ है ।
हमारे प्राचीन गुरुकुलों और ऋषिकुलों की पाठ-प्रणाली बड़ी सुखद थी । आज कल की भाँति अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध नहीं थे । पढ़ने वाले और पढ़ाने वालों में परस्पर शिष्य और गुरु का सम्बन्ध था । एक पुत्र और दूसरा पिता के समान माना जाता था और इसी प्रकार का परस्पर व्यवहार भी किया जाता था । यही कारण है कि पठन-पाठन में विशेष असुविधा न थी ।
सैत्तिरीयोपनिषद् में विद्यार्थी और अध्यापक के लिये बड़े ही उत्तम आदेश किये गये हैं । उन्हें हम यहाँ उद्धृत करते हैं :—
ऋतस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च । सत्यस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च । तपस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च । दमस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च । शमस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च । श्रद्धयस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च ।
१—नियमबद्धता के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
२—सत्य-भियता के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
३—परिश्रम-शीलता के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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४—इन्द्रिय-दमन के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
५—मनोनिग्रह के साथ विद्या को पढ़ाना और पढ़ाना चाहिये ।
६—विज्ञान-तर्क के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
७—अभिहोत्र के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
८—अतिथि-सत्कार के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
९—मनुष्योचित व्यवहार के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
१०—ज्ञान-सुधार के साथ पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
११—ब्रह्मचर्य रक्षा के सहित विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
१२—आश्रित-पालन के सहित विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
ऊपर कहे गये आदेशों में १२ बालें पठन और पाठन के लिये प्रधान बतलाई गई हैं। इनके देखने से हमें प्राचीन-काल की विचारशीलता का भली भाँति बोध हो जाता है। ऐसी उच्च शिक्षा-प्रणाली की जितनी प्रशंसा की जाय, थोड़ी है ।
१—नियम-बद्धता २—सत्य-भ्रियता ३—परिश्रम-शीलता—इन तीनों के बिना विद्या पढ़ी और पढ़ाई नहीं जा सकती। शिष्य और गुरु दोनों को नियम-बद्ध, सत्य-भ्रिय और परिश्रमशील होना आवश्यक है ।
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गुरु-महिमा
४—इन्द्रिय-दमन ५—मनोनिग्रह ६—विज्ञान-तर्क—इन तीनों के साथ विद्या पढ़ने और पढ़ाने से वह फलवती होती है। इन्द्रिय-लोळुपता, चित्त की अनस्थिरता और अन्य विध्वंस से पढ़ी या पढ़ाई गई विद्या कभी किसी अर्थ की नहीं होती।
७—अग्नि-होत्र ८—अतिथि सत्कार ९—मनुष्योचित न्यव-हार—ये तीनों सत्कर्म्य हैं। विद्या पढ़ने या पढ़ाने का यही अभिप्राय है कि इन कर्मण्यों का विधिवत् पालन हो। शिष्य और गुरु दोनों के लिये ये अत्यन्त उपयोगी है।
१०—जन-सुधार ११—ब्रह्मचर्य और १२—आश्रितपालन—इन तीनों के बिना भी विद्या का पढ़ना-पढ़ाया व्यर्थ है। शिष्य और गुरु दोनों को जन-सुधारक, ब्रह्मचारी और आश्रित-पालक बनना योग्य है।
यही कारण था कि प्राचीन समय में हमारे देश में शिष्य और गुरुओं की विद्या सफल होती थी। वे लोग इन्हीं आदेशों को ध्यान में रख कर विद्या पढ़ते और पढ़ाते थे। यदि आजकल भी इन आदेशों पर चला जाय, तो ब्रह्मचर्य और विद्या का पुनः देश भर में निश्चय रूप से प्रचार और सुधार किया जा सकता है।
११—गुरु-महिमा
“आचार्यस्तत्तत्तनभस्ती उमेहेमे उर्वा गम्भीरे दृषिर्वा दिवञ्च ।” (अथर्ववेद)
आचार्य अत्यन्त गम्भीर, मौलिक और आध्यात्मिक ज्ञान, जिससे दोनों लोकों का सुधार होता है, अपने शिष्य को कराता है। “गुरुः साक्षात्पर ब्रह्म, तस्म श्रीयुत्पे नमः ।”