ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचारी की प्रतिज्ञा
मैं ज्ञान कर कुशासन फौरव विद्या जचूँगा । ध्या करके ब्रह्मज्योतिः पायीं ले मैं यचूँगा ॥
गुरु-मंत्र से शिक्षा को वाँचूँगा नित्य ही मैं । फिर आचमन करूँगा सब धर्म कृत्य ही मैं । करके सुम्राण संयम अघमर्षणादि जप के । ध्याऊँगा सूर्य को मैं होगे जो धाम तप के ॥ जप से निःश्रुत होकर गुरु वन्दना करूँगा । संमुख सदैव गुरु के भिक्षा मैं ला धरूँगा ॥ आका गुरु को पाके श्रुति शास्त्र मैं पढ़ूँगा । करने को देश सेवा आगे सदा चढ़ूँगा ॥
खोऊँगा भूमि पर ही पीछूँगा शुद्ध पानी । सात्विक करूँगा भोजन जिससे वचूँगा क्षात्री ॥ यशु-मांस का विवर्जन है मुख्य धर्म मेरा । शास्त्रोक्त होम विधि ही है मुख्य कर्म मेरा ॥
मिथ्या कभी न बोल्हूँ प्रण को कभी न तोड़ूँ । धर्मार्थ कष्ट गो जी आये तो मुँह न मोड़ूँ ॥ सहकर के शीत-दर्रा तन को सुदृढ़ बनाऊँ । परमार्थ में ही अपना सर्वस्व मैं लगाऊँ ॥
स्त्री-संग से सदा ही वचता रहूँगा स्वामित्र । सद्ग्रंथ मैं सदा ही रचता रहूँगा स्वामित्र ॥ कर करके वीर्य-रक्षा तन-भन करूँगा पक्का । धरती पै डाल दूँगा दुष्टों को देके धक्का ॥ विद्या-कला का संचय मैं आज कर रहा हूँ । हृत्कोष मैं सुमति का पीयूष भर रहा हूँ ॥