भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विद्यान

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८—ब्रह्मचारी की प्रतिज्ञा

ब्रह्मवन्धु हो जाने पर बालक की संज्ञा ब्रह्मचारी हो जाती है। उसे गुरुकुल में जाने की आज्ञा मिलती है। उस समय वह बहुत सी बातों को, सबके सामने प्रतिज्ञा करता है। वह प्रतिज्ञा वास्तव में देखने ही योग्य है। उस प्रतिज्ञा का सारंश श्रीमान् पं० सूर्य नारायणजी आचार्य, जयपुर ने सुन्दर पद्यां में वर्णित किया है। पाठकों के लाभार्थ उसे इस यहाँ उद्धृत करते हैं:—

कविता

मैं ब्रह्मकुल का बालक बनता हूँ ब्रह्मचारी । पढ़ने को वेद विद्या करता हूँ मैं तयारी ॥ आचार्य ने कृपा कर उपनीत कर दिया है ॥ मन्त्रों से होम करने पावन मुझे किया है ॥ गुरुमंत्र का सदा ही करता रहूँगा जब मैं । सद्बुद्धि के उद्युहित करता रहूँगा तप मैं ॥ अस्त्रों मुझे कृपा कर देना वही सुमेधा । भ्याते जिसे पितर हैं सब देव श्री सुवेधा ॥ रक्षा सदैव करना गायत्री वेद मातः । करता हूँ ध्यान तेरा सार्य तथैव प्रातः ॥ मैं सूर्य के उदय से पहले सदा जगूँगा । बाहर नगर से जाकर शौच-किया करूँगा ॥ मूल सूत्र-इन्द्रियों को धोऊँगा मृत लगा कर । मैं ज्ञान-मन्त्र सारे पढ़ लूँगा चित्त लगाकर ॥