भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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यहोपवीत-विधि

अपनी अँजली में जल लेकर सविता के मन्त्र से विन्दु-चिन्हु कर शिष्य की अखलि में गिराता है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि तुम नम्रता-पूर्वक हमारी रक्षा में रहोगे, तो इसी प्रकार क्रमशः हम तुम्हें अपनी सारी विद्या पढ़ावेंगे। फिर कहता है कि सविता ने तेरा हाथ पकड़ा है और अग्नि तेरा आचार्य है। इसका अभिप्राय यह है कि तू तुर्य की भाँति तेजस्वी और अग्नि की भाँति पवित्र ब्रह्मचारी बन। फिर आचार्य बालक को सूर्य के दर्शन करा के प्रार्थना करता है।

तत्पश्चात् आचार्य बालक के हृदय पर दाहिना हाथ धरकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़ता है:—

ॐ मम मते ते हृदयं संदधामि। मम चित्तमनुचिन्नं ते अस्तु। मम वाचमेक मनाञ्चपस्व। बृहस्पतिस्त्वा नियुनपञ्च महाम्।

मेरे सदाचार के अनुकूल तेरा हृदय हो। मेरे चित्त का अनुसरण तेरा चित्त करे। मेरी वाणी का अनुकरण तेरी वाणी करे। विद्या के देव बृहस्पति तुम्हें मेरे सङ्ग नियुक्त करें।

आचार्य फिर ब्रह्मचारी का दाहिना हाथ पकड़ कर पूछता है:—

आचा०—को नामासि (तेरा क्या नाम है)

ब्रह्म०—अमुक शर्माऽहम्! (मेरा अमुक नाम है)

आचा०—कस्य ब्रह्मचार्यसीति? (तू किसका ब्रह्मचारी है)

ब्रह्म०—भवत इति। (मैं आपका ब्रह्मचारी हूँ)

आचा०—इन्द्रस्य ब्रह्मचार्यस्य श्रिराचार्यस्त्वाहमनाचार्यः।

जैसे इन्द्र ब्रह्मचारी है और उसका आचार्य अग्नि है, उसी प्रकार मैं तेरा हूँ।