भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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७—यज्ञोपवीत-विधि

“आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः ।”

( भगवद्गीता )

आचार्य उपनयन किये हुए ब्रह्मचारी को अपने संस्कार में रखता है ।

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं.

प्रजापते यत्सहजं पुरस्तात् ।

आयुष्यमर्धं प्रतिमुखं शुभ्रम्,

यज्ञोयवीतं बलमस्तु तेजः ॥

( प्रतबन्ध )

यज्ञोपवीत अत्यन्त पवित्र है । यह ब्रह्मा के आगे ही उत्पन्न हुआ । यह आयुष्य देने वाला है—स्वच्छ है । इसे धारण करो ! यह बल और तेज को बढ़ाता है ।

उपनयन-संस्कार की विधि भी बड़े उत्तम रहस्यों से भरी हुई है । इस संक्षेप में उसके मुख्य अङ्कों का वर्णन यहाँ पर कर देना चक्षित समझते हैं—

उपनयन से ब्रह्मचर्याश्रम का प्रारम्भ होता है । इसलिये इसका नाम ‘ब्रह्मादेश’ भी है । बालक का चौर-कर्म कराकर स्नान से शुद्ध होने पर, अग्नि में हवन कराया जाता है ।

तरपश्चात् अग्नि के समीप उभे यज्ञोपवीत धारण कराकर गायत्री-मन्त्र का उपदेश किया जाता है । इस समय भुगवम, मेखला, दण्ड और कौपीन उसे धारण करना पड़ता है । आचार्य अग्नि की उत्तर दिशा में पूर्वाभिमुख होकर बैठता है और