भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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उपनयन-संस्कार

यदि उपर्युक्त वर्णों से पूर्व यज्ञोपवीत न हुआ, तो वह बालक पवित्र हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि वह ब्रह्मचर्य और वेदाध्ययन के योग्य यहीं रह जाता। यिना यज्ञोपवीत के वह गुरुकुलों में भेजा नहीं जा सकता और अवस्था अधिक हो जाने से वह बालक कुसंस्कारी हो जाता है। अधिक अवस्था वाले बालक पर आचार्य अपना प्रभाव नहीं डाल सकता। जब कुसंस्कार दृढ़ हो जाते हैं, तो उनका दूर करना बड़ा कठिन हो जाता है। इसीलिये ब्रह्मचारी के लिये यज्ञोपवीत-सूत्र के अतिरिक्त शृंगचर्म, मेखला और दण्ड—ये तीन वस्तुयें भी आवश्यक हैं। भगवान् मनु ने इनका भी विधान वर्ण-क्रम के अनुसार भिन्न-भिन्न भाँति का किया है।

यज्ञोपवीत धारण करने का अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचारी अपने ब्रह्मचर्य, वेदाध्ययन और गुरु-शुश्रूषा में दृढ़ प्रतिज्ञता, उच्च-मता और क्षमता को प्राप्त करे। शृंगचर्म का यह अभिप्राय है कि पवित्रता, निःस्वार्थपरायणता और स्वाधीनता—पूर्वक वह अपना समय व्यतीत करे। मेखला का यह अभिप्राय है कि वह अपने अनुष्ठान में कटिबद्धता, नियमितता और धार्मिकता से लगा रहे, और दण्ड का यह अभिप्राय है कि उन्नत तथा उच्च विचारों से आत्म-दमन, शरीर-संरक्षण और निर्भौकत्व के लिये प्रयत्न करता रहे।