भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य-विधान

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यज्ञोपवीत संस्कार बड़े महत्व का है । इस संस्कार के साथ ही बालक का ब्रह्मचर्याश्रम प्रारम्भ होता है ।

इस संस्कार की प्रणाली वैदिक है । बिना इसके बालक वेद का अधिकारी नहीं होता । प्राचीन काल में इस संस्कार के हो जाने पर, माता-पिता अपने बालकों को गुरुकुलों में भेज देते थे । उपनीत बालक को उसका आचार्य वेद पढ़ाता था ।

प्रायः सभी स्थितियों में केवल द्विजाति को ही यज्ञोपवीत का अधिकारी माना है । मनुस्मृति में बालक के यज्ञोपवीत-काल का इस प्रकार विधान किया गया हैः—

गर्भाष्टमाष्ट्येऽकुर्वीत, ब्राह्मस्योपनायनम् । गर्भादेकादशोराहो, गर्भास्तु ब्राह्मविशः ॥

गर्भ से आठवें वर्ष में ब्राह्मण का, ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का और बारहवें में वैश्य का उपनयन करना चाहिये ।

ब्रह्मचर्यसंस्कारमस्य, कार्यं विप्रस्य पञ्चमे । राहो बलायिनिः पण्डे, वैश्यस्येहाथिनोऽष्टमे ॥

ब्रह्मज्ञेन की कामना से ब्राह्मण का पाँचवें वर्ष में, बलोत्साह की इच्छा से क्षत्रिय का छठे में और धनैश्वर्य के सनोरय से वैश्य का आठवें में उपनयन कर देना योग्य है ।

आपोऽहशष्ट ब्राह्मणस्य, सावित्रो नाति वर्सते । आह्वविशतुमवन्धो राचतु विशते विश्वम् ॥

सौत्रह वर्ष के पश्चात् ब्राह्मणों को, बाइस के पश्चात् क्षत्रियों को और चौबीस के पश्चात् वैश्यों को सावित्री ( गायत्री मन्त्र ) का उपदेश नहीं किया जा सकता ।