भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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उपनयन-संस्कार

पड़ता था। राजा और प्रजा दोनों गुरुकुल तथा ऋषिकुल का स्वतः सेवा किया करते थे।

जब से इस देश में गुरुकुल और ऋषिकुल की प्रणाली नष्ट हुई, तब से ब्रह्मचर्य और विद्या का लोप ही होता गया। आज कल की विद्यालय-प्रथा से शांताश लाभ भी नहीं होता। गुरुकुल काँगड़ी, ऋषिकुल हरद्वार, शान्ति निकेतन बोलपुर, सत्याग्रह आश्रम अहमदाबाद और कन्या-गुरुकुल दिल्ली से कुछ जनता का हित-साधन हो रहा है, पर इस देश की जन-संख्या को देखते हुये, अभी नितान्त अभाव जान पड़ता है। इन स्थानों में भी अभी प्राचीन आदर्शों की पूर्ति नहीं की जाती। इनके सञ्चालन में भी अभी प्राचीनता की बहुत कमी है। ये नवीन युग के अनुकूल चलने के उद्योग में हैं। हम इनका विरोध तो नहीं करते, पर इतना अवश्य कहेंगे कि ब्रह्मचर्य और विद्या की उन्नति के लिये, इनके पास अपूर्णे साधन हैं। अतएव हमारा विचार है कि वीर्य-रक्षा, विद्याध्ययन, संसार-सेवा और सुखार्थ्य की कामना से पुनः उस गुरु-कुल और ऋषि-कुल-प्रणाली का उद्धार करना चाहिये।

६—उपनयन-संस्कार

“संस्कारात्प्रबला जातिः।”

संस्कार के प्रभाव से जाति को प्रबला प्राप्त होती है।

“उपनीतो माणवको, वसेद्गुरुकुलेषु।”

उपनयन-संस्कार के हो जाने पर, ब्रह्मचारी गुरुकुलों में जा कर वास करे।