भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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प्रहस्य-विज्ञान

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विधिवत् पालन कर, वान-प्रस्थाश्रम में प्रवृष्ट होते थे । वे यथा समय पुत्र और पौत्रों को गृह पर छोड़ कर, इस आश्रम में पशु-रते थे । वे पत्नी को भी त्याग देते थे, या उनके स्वीकार करने पर अपने साथ रखते थे । उनके आयुष्य का रूची या शेष सम्पूर्ण भाग ब्रह्मचारियों के विद्या-दान और सद्वृत्तान के चिन्तन में व्यतीत होता था ।

ऋषि लोग वे होते थे, जो सद्वै ब्रह्मचारी रह कर, लोक का कल्याण करते थे । विद्या-दान को वे सब से बड़ा पुण्य समझते थे । इसलिये वे प्रायः विद्यार्थियों को अपने यहाँ रखकर वेदवत्था वेदाङ्गों की शिक्षा देते थे । विवाह उनकी इच्छा पर निर्भर रहता था । उनका जीवन परम पवित्र और सात्त्विक होता था । विद्यार्थी लोग उनके अनुकरण से अपने को योग्य बनाते थे ।

गुरुओं और ऋषियों के सिद्धान्त प्रायः एक से थे । गुरु लोगों की अपेक्षा ऋषि लोग अधिक निःस्वार्थी होते थे । सपत्नीक रहने के कारण गुरुओं को विशेष आवश्यकता रहती थी, पर ऋषियों को विशेष मुश्कता थी ।

इन गुरुकुलों और ऋषिकुलों में राजा तथा अन्य धर्मात्मा पुरुष ब्रह्मचारियों के दर्शन के लिये आते थे और उचित सहायता देने के लिये प्रार्थना करते थे । विद्यार्थी और गुरु सभी स्वात्मानन्दमयी होते थे । वे अपने लिये परिश्रम और पुरुषार्थ से स्वयं वृत्ति-उपाजित कर लेते थे ।

इस गुरुकुल और ऋषिकुल-प्राणाली से देश और समाज का बड़ा लाभ होता था । राजा को शिक्षा-विभाग नियत करने की आवश्यकता न थी । प्रजा को शिक्षा के लिये कुछ नहीं उठाना